रविवार, जनवरी 29, 2012

कबीर द्वारा अपना परिचय देना

तीन लोक पिंजरा भया । पाप पुण्य दो जाल । सभी जीव भोजन भये । एक खाने वाला काल ।
इच्छा रूपी खेलन आया । तातैं सुख सागर नहीं पाया ।
बिन ही मुख सारंग राग सुन । बिन ही तंती तार । बिना सुर अलगोजे बजैं । नगर नांच घुमार ।
घण्टा बाजै ताल नग । मंजीरे डफ झांझ । मूरली मधूर सुहावनी । निसबासर और सांझ ।
बीन बिहंगम बाजहिं । तरक तम्बूरे तीर । राग खण्ड नहीं होत है । बंध्या रहत समीर ।
तरक नहीं तोरा नहीं । नांही कशीस कबाब । अमृत प्याले मध पीवैं । ज्यों भाटी चवैं शराब ।
मतवाले मस्तानपुर । गली गली गुलजार । संख शराबी फिरत हैं । चलो तास बजार ।
संख संख पत्नी नाचैं । गावैं शब्द सुभान । चंद्र बदन सूरजमुखी । नांही मान गुमान ।
संख हिंडोले नूर नग । झूलैं संत हजूर । तख्त धनी के पास कर । ऐसा मुलक जहूर ।
नदी नाव नाले बगैं । छूटैं फुहारे सुन्न । भरे होद सरवर सदा । नहीं पाप नहीं पुण्य ।
ना कोई भिक्षुक दान दे । ना कोई हार व्यवहार । ना कोई जन्मे मरे । ऐसा देश हमार ।
जहां संखों लहर मेहर की उपजैं । कहर जहां नहीं कोई । दास गरीब अचल अविनाशी । सुख का सागर सोई ।
आत्म प्राण उद्धार हीं । ऐसा धर्म नहीं और । कोटि अश्वमेघ यज्ञ । सकल समाना भौर ।
चौरासी बंधन कटे । कीनी कलप कबीर । भवन चतुरदश लोक सब । टूटे जम जंजीर ।
अनंत कोटि बृह्माण्ड में । बंदी छोड़ कहाय । सो तौ एक कबीर हैं । जननी जन्या न माय ।
शब्द स्वरूप साहिब धनी । शब्द सिंध सब माँहि । बाहर भीतर रमि रहया । जहाँ तहां सब ठांहि ।
जल थल पृथ्वी गगन में । बाहर भीतर एक । पूरण बृह्म कबीर हैं । अविगत पुरूष अलेख  ।
सेवक होय करि ऊतरे । इस पृथ्वी के माँहि । जीव उद्धारन जगत गुरु । बार बार बलि जांहि ।
काशीपुरी कस्त किया । उतरे अधर अधार । मोमन कूं मुजरा हुवा । जंगल में दीदार ।
कोटि किरण शशि भान सुधि । आसन अधर बिमान । परसत पूरण बृह्म कूं । शीतल पिंडरू प्राण ।
गोद लिया मुख चूंबि करि । हेम रूप झलकंत । जगर मगर काया करै । दमकैं पदम अनंत ।
काशी उमटी गुल भया । मोमन का घर घेर । कोई कहै बृह्मा विष्णु हैं । कोई कहै इन्द्र कुबेर ।
कोई कहै छल ईश्वर नहीं । कोई किंनर कहलाय । कोई कहै गण ईश का । ज्यूं ज्यूं मात रिसाय ।
कोई कहै वरूण धर्मराय है । कोई कोई कहते ईश । सोलह कला सुभांन गति । कोई कहै जगदीश ।
भक्ति मुक्ति ले ऊतरे । मेटन तीनूं ताप । मोमन के डेरा लिया । कहै कबीरा बाप ।
दूध न पीवै न अन्न भखै । नहीं पलने झूलंत । अधर अमान धियान में । कमल कला फूलंत ।
काशी में अचरज भया । गई जगत की नींद । ऐसे दुल्हे ऊतरे । ज्यूं कन्या वर बींद ।
खलक मुलक देखन गया । राजा प्रजा रीत । जंबू दीप जहान में । उतरे शब्द अतीत ।
दुनी कहै योह देव है । देव कहत हैं ईश । ईश कहै परबृह्म है । पूरण बीसवे बीस ।
आदि अंत हमरा नहीं । मध्य मिलावा मूल । बृह्म ज्ञान सुनाईया । धर पिंडा अस्थूल ।
श्वेत भूमिका हम गए । जहां विश्वम्भरनाथ । हरियम हीरा नाम दे । अष्ट कमल दल स्वांति ।
हम बैरागी बृह्म पद । सन्यासी महादेव । सोहं मंत्र दिया शंकर कूं । करत हमारी सेव ।
हम सुल्तानी नानक तारे । दादू कूं उपदेश दिया । जाति जुलाहा भेद न पाया । कांशी माहे कबीर हुआ ।
सतयुग में सतसुकृत कहैं टेरा । त्रेता नाम मुनिन्द्र मेरा ।
द्वापर में करूणामय कहलाया । कलियुग में नाम कबीर धराया ।
चारों युगों में हम पुकारै । कूक कहया हम हेल रे । हीरे मानिक मोती बरसें । ये जग चुगता ढेल रे ।
सतगुरु पुरुष कबीर हैं । चारों युग प्रवान । झूठे गुरुवा मर गए । हो गए भूत मसान ।
जैसे माता गर्भ को । राखे जतन बनाय । ठेस लगे तो क्षीण होवे । तेरी ऐसे भक्ति जाय ।
रहे नल नील जतन कर हार । तब सतगुरू से करी पुकार ।
जा सत रेखा लिखी अपार । सिन्धु पर शिला तिराने वाले ।
धन धन सतगुरु सत कबीर । भक्त की पीर मिटाने वाले ।
कबीर तीन देव को सब कोई ध्यावै । चौथे देव का मरम न पावै ।
चौथा छाड़ पंचम को ध्यावै । कहै कबीर सो हम पर आवै ।
ओंकार निश्चय भया । यह कर्ता मत जान । सांचा शब्द कबीर का । परदे मांही पहचान ।
राम कृष्ण अवतार हैं । इनका नांही संसार । जिन साहेब संसार किया । सो किन्हूं न जनमया नार
चार भुजा के भजन में । भूलि परे सब संत । कबिरा सुमिरो तासु को । जाके भुजा अनंत ।
समुद्र पाट लंका गये । सीता को भरतार । ताहि अगस्त मुनि पीय गयो । इनमें को करतार ।
गिरवर धारयो कृष्ण जी । द्रोणागिरि हनुमंत । शेष नाग सब सृष्टि सहारी । इनमें को भगवंत ।
काटे बंधन विपति में । कठिन किया संग्राम । चिन्हों रे नर प्राणियां । गरुड बड़ो की राम ।
कह कबीर चित चेतहं । शब्द करौ निरूवार । श्रीरामहि कर्ता कहत हैं । भूलि परयो संसार ।
जिन राम कृष्ण व निरंजन कियो । सो तो करता न्यार । अंधा ज्ञान न बूझई । कहै कबीर विचार ।
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धर्मदास यहाँ घना अंधेरा । बिन परचय जीव जम का चेरा ।
काल डरै करतार से । जय जय जय जगदीश । जौरा जौरी झाड़ती । पग रज डारे शीश ।
काल जो पीसै पीसना । जौरा है पनिहार । ये दो असल मजूर हैं । मेरे साहेब के दरबार ।
जीवन तो थोड़ा भला । जै सत सुमरण हो । लाख वर्ष का जीवना । लेखे धरे ना को ।
रामानंद अधिकार सुनि । जुलहा एक जगदीश । दास गरीब बिलंब ना । ताहि नवावत शीश ।
रामानंद कूं गुरु कहै । तनसैं नहीं मिलात । दास गरीब दर्शन भये । पैडे लगी जुं लात ।
पंथ चलत ठोकर लगी । रामनाम कहि दीन । दास गरीब कसर नहीं । सीख लई प्रबीन ।
आडा पडदा लाय करि । रामानंद बूझंत । दास गरीब कुलंग छबि । अधर डाक कूदंत ।
कौन जाति कुल पंथ है । कौन तुम्हारा नाम । दास गरीब अधीन गति । बोलत है बलि जांव ।
जाति हमारी जगतगुरु । परमेश्वर पद पंथ । दास गरीब लिखति परै । नाम निंरजन कंत ।
रे बालक सुन दुर्बद्धि । घट मठ तन आकार । दास गरीब दरद लगया । हो बोले सिरजनहार ।
तुम मोमन के पालवा । जुलहै के घर बास । दास गरीब अज्ञान गति । एता दृढ़ विश्वास ।
मान बडाई छांडि करि । बोलौ बालक बैंन । दास गरीब अधम मुखी । एता तुम घट फैंन ।
तर्क तलूसैं बोलतै । रामानंद सुर ज्ञान । दास गरीब कुजाति है । आखर नीच निदान ।
कबीर साहब का उत्तर -
महके बदन खुलास कर । सुनि स्वामी प्रबीन । दास गरीब मनी मरै । मैं आजिज आधीन ।
मैं अविगत गति से परै । चार बेद से दूर । दास गरीब दशौं दिशा । सकल सिंध भरपूर ।
सकल सिंध भरपूर हूँ । खालिक हमरा नाम । दास गरीब अजाति हूँ । तैं जूं कहया बलि जांव ।
जाति पाति मेरे नहीं । नहीं बस्ती नहीं गाम । दास गरीब अनिन गति । नहीं हमारे नाम ।
नाद बिंद मेरे नहीं । नहीं गुदा नहीं गात । दास गरीब शब्द सजा । नहीं किसी का साथ ।
सब संगी बिछरू नहीं । आदि अंत बहु जांहि । दास गरीब सकल वंसु । बाहर भीतर माँहि ।
ए स्वामी सृष्टा मैं । सृष्टि हमारै तीर । दास गरीब अधर बसूं । अविगत सत्य कबीर ।
पौहमी धरणि आकाश मैं । मैं व्यापक सब ठौर । दास गरीब न दूसरा । हम समतुल नहीं और ।
हम दासन के दास हैं । करता पुरुष करीम । दास गरीब अवधूत हम । हम बृह्मचारी सीम । ।
सुनि रामानंद राम हम । मैं बावन नरसिंह । दास गरीब कली कली । हमहीं से कृष्ण अभंग ।
हमहीं से इंद्र कुबेर हैं । बृह्मा बिष्णु महेश । दास गरीब धरम ध्वजा । धरणि रसातल शेष ।
सुनि स्वामी सति भाखहूँ । झूठ न हमरै रिंच । दास गरीब हम रूप बिन । और सकल प्रपंच ।
गोता लाऊं स्वर्ग सैं । फिरि पैठूं पाताल । गरीब दास ढूंढत फिरूं । हीरे माणिक लाल ।
इस दरिया कंकर बहुत । लाल कहीं कहीं ठाव । गरीब दास माणिक चुगैं । हम मुरजीवा नांव ।
मुरजीवा माणिक चुगैं । कंकर पत्थर डारि । दास गरीब डोरी अगम । उतरो शब्द अधार ।
बोलत रामानंदजी । हम घर बडा सुकाल । गरीबदास पूजा करैं । मुकुट फही जदि माल ।
सेवा करौं संभाल करि । सुनि स्वामी सुर ज्ञान । गरीबदास शिर मुकुट धरि । माला अटकी जान ।
स्वामी घुंडी खोलि करि । फिर माला गल डार । गरीबदास इस भजन कूं । जानत है करतार ।
डयौढी पडदा दूरि करि । लीया कंठ लगाय । गरीबदास गुजरी बहुत । बदनैं बदन मिलाय ।
मन की पूजा तुम लखी । मुकुट माल परबेश । गरीबदास गति को लखै । कौन वरण क्या भेष ।
यह तौ तुम शिक्षा दई । मानि लई मनमोर । गरीबदास कोमल पुरूष । हमरा बदन कठोर ।
सुनि बच्चा मैं स्वर्ग की । कैसैं छांडौं रीति । गरीबदास गुदरी लगी । जनम जात है बीत ।
चार मुक्ति बैकुंठ मैं । जिनकी मोरै चाह । गरीबदास घर अगम की । कैसैं पाऊं थाह ।
हेम रूप जहाँ धरणि है । रतन जडे बौह शोभ । गरीबदास बैकुंठ कूं । तन मन हमरा लोभ ।
शंख चक्र गदा पदम हैं । मोहन मदन मुरारि । गरीबदास मुरली बजै । सुरग लोक दरबारि ।
दूधौं की नदियां बगैं । सेत वृक्ष सुभान । गरीबदास मंदल मुक्ति । सुरगापुर अस्थान ।
रतन जडाऊ मनुष्य हैं । गण गंधर्व सब देव । गरीबदास उस धाम की । कैसैं छाडूं सेव ।
ऋग युज साम अथर्वणं । गावैं चारौं वेद । गरीबदास घर अगम की । कैसैं जानो भेद ।
चार मुक्ति चितवन लगी । कैसैं बंचूं ताहि । गरीबदास गुप्तार गति । हमकूं द्यौ समझाय ।
सुरग लोक बैकुंठ है । यासैं परै न और । गरीबदास षट शास्त्र । चार बेद की दौर ।
चार बेद गावैं तिसैं । सुर नर मुनि मिलाप । गरीबदास धु्रव पोर जिस । मिटि गये तीनूं ताप ।
प्रहलाद गये तिस लोक कूं । सुरगा पुरी समूल । गरीबदास हरि भक्ति की । मैं बंचत हूँ धूल ।
बिंद्रावन गये तिस लोक कूं । सुरगा पुरी समूल । गरीबदास उस मुक्ति कूं । कैसैं जाऊं भूल ।
नारद बृह्मा तिस रटैं । गावैं शेष गणेश । गरीबदास बैकुंठ सैं । और परै को देश ।
सहंस अठासी जिस जपैं । और तैतीसौं सेव । गरीबदास जासैं परै । और कौन है देव । ।
सुनि स्वामी निज मूल गति । कहि समझाऊं तोहि ।गरीबदास भगवान कूं । राख्या जगत समोहि ।
तीनि लोक के जीव सब । विषय वास भरमाय । गरीबदास हमकूं जपैं । तिसकूं धाम दिखाय ।
जो देखैगा धाम कूं । सो जानत है मुझ । गरीबदास तोसैं कहं । सुनि गायत्री गुझ ।
कृष्ण विष्णु भगवान कूं । जहडायं हैं जीव । गरीबदास त्रिलोक मैं । काल कर्म शिर शीव ।
सुनि स्वामी तोसैं कहूँ । अगम दीप की सैल । गरीबदास पूठे परे । पुस्तक लादे बैल ।
पौहमी धरणि अकाश थंभ । चलसी चंदर सूर । गरीबदास रज बिरज की । कहाँ रहैगी धूर ।
नारायण त्रिलोक सब । चलसी इन्द्र कुबेर । गरीबदास सब जात हैं । सुरग पाताल सुमेर । ।
चार मुक्ति बैकुठ बट । फना हुआ कई बार । गरीबदास अलप रूप मघ । क्या जानैं संसार ।
कहौ स्वामी कित रहौगे । चौदह भुवन बिहंड । गरीबदास बीजक कहया । चलत प्राण और पिंड ।
सुन स्वामी एक शक्ति है । अरधंगी कार । गरीबदास बीजक तहां । अनंत लोक सिंघार ।
जैसे का तैसा रहै । परलो फना प्रान । गरीबदास उस शक्ति कूं । बार बार कुरबांन ।
कोटि इन्द्र बृह्मा जहाँ । कोटि कृष्ण कैलास । गरीबदास शिव कोटि हैं । करौ कौंन की आश ।
कोटि विष्णु जहाँ बसत हैं । उस शक्ति के धाम । गरीबदास गुल बहुत हैं । अलफ बस्त निहकाम ।
शिव शक्ति जासै हुए । अनंत कोटि अवतार । गरीबदास उस अलफ कूं । लखै सो होय करतार ।
अलफ हमारा रूप है । दम देही नहीं दंत । गरीबदास गुल सैं परै । चलना है बिन पंथ ।
बिना पंथ उस कंत कै । धाम चलन है मोर । गरीबदास गति ना किसी । संख सुरग पर डोर ।
संख सुरग पर हम बसैं । सुनि स्वामी यह सैंन । गरीबदास हम अलफ हैं । यौह गुल फोकट फैंन ।
जो तै कहया सौ मैं लहया । बिन देखै नहीं धीज । गरीबदास स्वामी कहै । कहाँ अलफ वौ बीज ।
अनंत कोटि बृह्माण्ड फण । अनंत कोटि उदगार । गरीबदास स्वामी कहै । कहां अलफ दीदार ।
हद बेहद कहीं ना कहीं । ना कहीं थरपी ठौर । गरीबदास निज बृह्म की । कौंन धाम वह पौर ।
चल स्वामी सर पर चलैं । गंग तीर सुन ज्ञान । गरीबदास बैकुंठ बट । कोटि कोटि घट ध्यान ।
तहां कोटि वैकुंठ हैं । नक सरवर संगीत । गरीबदास स्वामी सुनैं । जात अनन्त जुग बीत ।
प्राण पिंड पुर मैं धसौ । गये रामानंद कोटि । गरीबदास सर सुरग मैं । रहौ शब्दकी ओट ।
तहां वहाँ चित चकित भया । देखि फजल दरबार । गरीबदास सजदा किया । हम पाये दीदार ।
तुम स्वामी मैं बाल बुद्धि । भर्म कर्म किये नाश । गरीबदास निज बृह्म तुम । हमरै दृढ़ विश्वास ।
सुन्न बेसुन्न सैं तुम परै । उरैं से हमरै तीर । गरीबदास सरबंग मैं । अविगत पुरूष कबीर ।
कोटि कोटि सजदे करैं । कोटि कोटि प्रणाम । गरीबदास अनहद अधर । हम परसैं तुम धाम । ।
सुनि स्वामी एक गल गुझ । तिल तारी पल जोरि । गरीबदास सर गगन मैं । सूरज अनंत करोरि ।
सहर अमान अनन्तपुर । रिमझिम रिमझिम होय । गरीबदास उस नगर का । मरम न जानैं कोय । ।
सुनि स्वामी कैसैं लखौ । कहि समझाऊं तोहि । गरीबदास बिन पर उडैं । तन मन शीश न होय ।
रवनपुरी एक चक्र है । तहाँ धनजय बाय । गरीबदास जीते जन्म । याकूँ लेत समाय ।
आसन पदम लगायकर । भिरंग नाद को खैंचि । गरीबदास अचवन करै । देवदत्त को ऐचि ।
काली ऊन कुलीन रंग । जाकै दो फुन धार । गरीबदास कुरंभ शिर । तास करे उद्धार ।
चिश्में लाल गुलाल रंग । तीनि गिरह नभ पेंच । गरीबदास वह नागनी कूँ । हौने न देवे रेच ।
कुंभक रेचक सब करै । ऊन करत उदगार । गरीबदास उस नागनी कूँ । जीतै कोई खिलार ।
कुंभ भरै रेचक करै । फिर टुटत है पौन । गरीबदास गगन मण्डल । नहीं होत है रौन ।
आगे घाटी बंद है । इङा पिंगला दोय । गरीबदास सुषमन खुले । तास मिलावा होय ।
चंदा के घर सूर रखि । सूरज के घर चंद । गरीबदास मध्य महल है । तहाँ वहाँ अजब आनन्द ।
त्रिवेणी का घाट है । गंग जमन गुपतार । गरीबदास परबी परखि । तहाँ सहंस मुख धार ।
मध्य किवारी बृह्मरंध्र । वाह खोलत नहीं कोय । गरीबदास सब जोग की । पेज पीछाड़े होय ।
आसन सम्पट सुधि कर । गुफा गिरद गति ढोल । गरीबदास पल पालड़ै । हीरे मानिक तोल ।
पान अपान समान सुध । मंदा चल महकंत । गरीबदास ठाठी बगै । तो दीपक बात बुंझत ।
घंटा टुटे ताल भंग । संख न सुनिए टेर । गरीबदास मुरली मुक्ति । सुनि चढ़ी हंस सुमेर ।
खुलहै खिरकी सहज धुनि । दम नहीं खैंच अतीत । गरीबदास एक सैन है । तजि अनभय छंद गीत ।
धीरैं धीरैं दाटी हैं । सुरग चढैंगे सोय । गरीबदास पग पंथ बिन । ले राखौं जहाँ तोय ।
सुन स्वामी सीढी बिना । चढौं गगन कैलास । गरीबदास प्राणायाम तजि । नाहक तोरत श्वास ।
गली गली गलतान है । सहर सलेमाबाद । गरीबदास पल बीच मैं । पूरण करौं मुराद ।
ज्यूं का त्यूं ही बैठि रहो । तजि आसन सब जोग । गरीबदास पल बीच पद । सर्व सैल सब भोग ।
पनग पलक नीचै करौ । ता मुख सहंस शरीर । गरीबदास सूक्ष्म अधरि । सूरति लाय सर तीर ।
सुनि स्वामी यह गति अगम । मनुष्य देव सैं दूर । गरीबदास बृह्मा थकै । किन्हैं न पाया मूर ।
मूल डार जाकै नहीं । है सो अनिन अरंग । गरीबदास मजीठ चलि । ये सब लोक पतंग ।
सुतह सिधि परकाशिया । कहा अरघ असनान । गरीबदास तप कोटि जुग । पचि हारे सुर ज्ञान ।
श्याम सेत नहीं लाल है । नाहीं पीत पसाव । गरीबदास कासैं कहूँ । चलै नीर बिन नाव ।
कोटि कोटि बैकुंठ हैं । कोटि कोटि शिव शेष । गरीबदास उस धाम मैं । बृह्मा कोटि नरेश ।
अवादान अमानपुर । चलि स्वामी तहां चाल । गरीबदास परलो अनंत । बौहरि न झंपै काल ।
अमर चीर तहां पहरि है । अमर हंस सुख धाम । गरीबदास भोजन अजर । चल स्वामी निज धाम ।
बोलत रामानंदजी । सुन कबीर करतार । गरीबदास सब रूप मैं । तुमहीं बोलन हार ।
तुम साहिब तुम संत हौ । तुम सतगुरु तुम हंस । गरीबदास तुम रूप बिन । और न दूजा अंस ।
मैं भगता मुक्ता भया । किया कर्म कुन्द नाश । गरीबदास अविगत मिले । मेटी मन की बास ।
दोहूँ ठौर है एक तूं । भया एक से दोय । गरीबदास हम कारणैं । उतरे हैं मघ जोय ।
गोष्टी रामानंद सैं । कांशी नगर मंझार । गरीबदास जिंद पीर के । हम पाये दीदार ।
बोलै रामानंद ।  सुनौं कबीर सुभांन । गरीबदास मुक्ता भये । उधरे पिंड अरु प्राण ।
तहां वहाँ चित चकित भया । देखि फजल दरबार । गरीबदास सजदा किया । हम पाये दीदार ।
तुम स्वामी मैं बाल बुद्धि । भर्म कर्म किये नाश । गरीबदास निज बृह्म तुम । हमरै दृढ़ विश्वास ।
सुन्न बेसुन्न सैं तुम परै । उरैं से हमरै तीर । गरीबदास सरबंग मैं । अविगत पुरूष कबीर ।
कोटि कोटि सजदे करैं । कोटि कोटि प्रणाम । गरीबदास अनहद अधर । हम परसैं तुम धाम ।
बोलत रामानंदजी । सुन कबीर करतार । गरीबदास सब रूप मैं । तुमहीं बोलन हार ।
तुम साहिब तुम संत हौ । तुम सतगुरु तुम हंस । गरीबदास तुम रूप बिन । और न दूजा अंस ।
मैं भगता मुक्ता भया । किया कर्म कुन्द नाश । गरीबदास अविगत मिले । मेटी मन की बास ।
दोहूँ ठौर है एक तूं । भया एक से दोय । गरीबदास हम कारणैं । उतरे हैं मघ जोय ।
दहूँ ठोड़ है एक तूं । भया एक से दो । गरीबदास हम कारणे । आए हो मग जो ।
मैं भक्ता मुक्ता भया । कर्म कुण्द भये नाश । गरीबदास अविगत मिले । मिट गई मन की बांस ।
बेद हमारा भेद है । मैं बेदों में नाहीं । जिस बेद से मैं मिलूं । बेद जानते नाहीं ।

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