बुधवार, जनवरी 04, 2012

दीक्षा लेने की क्या आवश्यकता मैं तो खुद गुरु हूँ

1 प्रश्न - स्वामी जी ! दीक्षा लेने की क्या आवश्यकता है ? स्वयं अपने बल पर साधना करने से भी तो साधना पूरी हो सकती है ।
ऊत्तर - श्री स्वामी जी महाराज कहते हैं कि - हे प्रिय शिष्य ! दीक्षा लिये बिना मन की एकाग्रता नहीं होती । आज शायद तुम्हारे मन में कोई देवी देवता अच्छा लगे । कल कोई सन्त महात्मा अच्छा लगे । और अगले दिन कोई सदगुरू अच्छा लगे । परिणाम स्वरूप किसी में भी एकाग्रता नहीं हो सकती है । यदि मन स्थिर न हो । तो भगवान ( सदगुरू ) का लाभ तो दूर की बात है । मामूली सांसारिक कर्मों में भी गडबडी होने लगती है । भगवान लाभ करने के लिये श्री सदगुरू देव भगवान की नितान्त आवश्यकता है ।
गुरू के बतलाये हुए नाम मात्र का जप व ध्यान करने से और श्री सदगुरू देव जी महाराज की दया से सब ठीक हो जाता है । या सर्व समर्थ श्री सदगुरु जी महाराज ठीक कर देते हैं । श्री सदगुरू देव जी महाराज के वचनों पर विश्वास करके यदि निष्ठापूर्वक तथा श्रद्धा सहित भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान न करोगे । तो किसी भी हालत में कुछ की भी प्राप्ति नहीं हो सकती है । धर्म का मार्ग अति कठिन है । श्री सदगुरू का आश्रय मिले बिना चाहे जितना भी बुद्धिमान क्यों न हो । कोटिश: प्रयत्न क्यों न करे । ठोकर खाकर गिर ही पडेगा । साधारण सी बात है कि चाहे जो भी कला सीखना चाहो । उस कला को प्राप्त करने के लिये उस कला के गुरू master को मानना ही पडेगा । और

उसी के निर्देशानुसार सीखना पडेगा । तब वह विधा या कला सीख पाओगे । तब फ़िर इतनी श्रेष्ठ बृह्म विधा का लाभ प्राप्त करने के लिये गुरू की आवशयकता क्यों नहीं पडेगी ? गुरू की आवश्यकता अवश्य पडेगी । और सदा पडेगी ।
यदि भगवान लाभ चाहते हो । तो धैर्य धारण कर भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान करते जाओ । समय आने पर सब होगा । वे खुद जानते हैं कि - वे कब दर्शन देंगे । बिना श्रद्धा के दौड धूप करने से कोई फ़ायदा नहीं होगा । श्री स्वामी जी महाराज सतसंग के दौरान कहा करते थे कि समय से पहले पक्षी अपना अण्डा तक नहीं फ़ोडता है । ऐसे अवसर पर मन की अवस्था बहुत ही कष्टदायक होती है । एक बार आशा । फ़िर निराशा । कभी हंसना । कभी रोना । वस्तु लाभ न होने पर दिन इसी तरह कट जाते हैं । परन्तु उत्तम गुरू पा जाने से वे मन को इस अवस्था से भी झट से ऊपर उठा सकते हैं । किन्तु यदि बिना ठीक समय के आये इस प्रकार मन को ऊपर उठा दिया जाय । तो उसका वेग सम्हाला नहीं जा सकता । उल्टे शरीर और मन का अनिष्ट होता है । ऐसी अवस्था में बडी सावधानी से रहना पडता है । श्री सदगुरू के आश्रम में रहकर उनके उपदेश अनुसार सात्त्विक आहार । पूर्ण बृह्मचर्य पालन इत्यादि नियमों का सुचारू रूप से पालन करना पडता है । यदि ऐसा न किया जाय । तो सिर का गरम होना । सिर चकराना इत्यादि रोगों का सामना करना पडता है ।
2 प्रश्न - हे श्री सदगुरू देव जी महाराज ! मुझे भजन । सुमिरन । ध्यान एक साथ करने का आदेश मिला है । परन्तु ध्यान तो बिल्कुल नहीं होता है । इसलिये मन बीच बीच में बहुत खराब हो जाता है ।
उत्तर - हे प्रिय भक्त ! निराशा उत्पन्न होना स्वाभाविक है । 1 दिन 1 भक्ति को आश्रम में ऐसा हुआ था । उस समय उसकी उमृ बहुत कम थी । भजन । सुमिरन । ध्यान करने की जो विधि बतलाई गयी थी । उसको रोज करता था । क्योंकि श्री स्वामी जी महाराज का सबको भजन । सेवा । ध्यान करने का कडा निर्देश था । उमृ कम और करने का शौक तो था ही । लेकिन मन चंचल बहुत था । जब भजन । सुमिरन । ध्यान करता । तो कभी 


ध्यान होता । कभी नहीं होता था । तो मन में बडी घबराहट व बडी ग्लानि भी होती थी । श्री सदगुरू देव जी महाराज से कहने में बडा डर लगता था । 1 दिन मन में आया कि इतने दिन से यहां आया हूं । कुछ भी तो अभी नहीं बना । अर्थात न भजन होता । न ध्यान ही आता है । फ़िर क्या यहां रहूं । जाय सब चूल्हे में । श्री स्वामी जी से भी कुछ नहीं बतलाया । मन ही मन सोच रहा था कि यदि इसी तरह 2-4  दिन और चला । तो घर वापस चला जाऊंगा । ऐसा सोचता हुआ बाहर आ रहा था कि श्री स्वामी जी महाराज ने उसे देख लिया । वे अन्दर कमरे में चले गये । तब सबका नियम था कि मन्दिर में आरती । पूजा के बाद सब लोग श्री स्वामी जी के दर्शन करने के लिये जाते थे । श्री स्वामी जी महाराज का दर्शन करने के बाद सब कोई नीचे प्रसाद लेने जाते थे । जब दण्डवत प्रणाम कर उठा । तो श्री स्वामी जी महाराज बोले - देख । तू जब मन्दिर से आ रहा था । तब देखा कि तेरा मन मानों मैल से ढंक गया है । यह सब सुनकर भक्त ने सोचा । हाय रे । श्री स्वामी जी महाराज तो सब कुछ मेरे अन्दर की बात जान गये । वह बोला - मेरा मन सचमुच खराब हो गया है । आप सब कुछ जान गये हैं । तब उन्होंने उसका मुंह खोलवाकर जीभ पर कुछ लिख दिया । तुरन्त ही पहले का सारा कष्ट भूल गया । और आनन्द में विभोर हो गया । जब भी उनके पास जाता । या रहता था । हमेशा आनन्द से भरपूर रहता था । इसीलिये तो सिद्ध एवं शक्तिशाली गुरू की आवश्यकता होती है ।


3 प्रश्न - आजकल बहुत से लोग दीक्षा लेकर भजन । सुमिरन । ध्यान तो करते ही नहीं । बल्कि बडी बडी डींगे मारते रहते हैं ।
उत्तर - बहुत धैर्य चाहिए । धैर्य धारण कर । भजन । सुमिरन । ध्यान की साधना करते जाओ । जब तक तत्त्व लाभ न हो । तब तक खूब मेहनत करो । यानी खूब मेहनत । लगन । और श्रद्धा से भजन । सुमिरन । ध्यान की साधना नियमित नियमानुसार सदा करते रहो । पहले पहल साधना बेगारी करने के समान नीरस मालूम पडती है । जैसे अ आ का सीखना । परन्तु धैर्य पूर्वक लगे रहने पर यानी भजन । सुमिरन । ध्यान करते रहने पर । धीरे धीरे भजन । ध्यान होने लग जाता है । और मन को शान्ति भी मिलने लग जाती है । दीक्षा लेने के बाद जो सिर्फ़ शिकायत करते हैं । और कहते हैं कि महाराज जी ! कुछ तो नहीं हो रहा है । उनकी बात 2-3 साल तक बिलकुल नहीं सुना । बल्कि उन्हें समझा बुझाकर तसल्ली देकर छोड देता था । इसके बाद वे लोग खुद ही आकर कहते थे कि - हां महाराज जी । अब कुछ कुछ हो रहा है । यह जल्दबाजी की चीज नहीं है । 2-3 साल का खूब भजन । सुमिरन । ध्यान की साधना करो । फ़िर आनन्द मिलने लगेगा । तुम्हारी बात सुनकर बडा आनन्द आया । आजकल अनेक लोग काम चोरी करते हुए छल से अपना काम बन लेना चाहते हैं । पर यह आध्यात्मिकता की बात है । और सच्चे दरबार में झूठ और चापलूसी ज्यादा दिन नहीं चलती । अन्त में भाण्डा फ़ूट जाता है ।

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