सोमवार, जनवरी 23, 2012

भजन और ध्यान की भूख पैदा होना ही आगे का रास्ता चलना है

72 प्रश्न - महाराज जी ! गुरू भाइयों से बातचीत के दौरान मालूम होता है । और मेरे साथ भी ऐसा होता है कि कभी कभी भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान में खूब मन लगता है । और उसमें आनन्द आता है । और कभी भजन, सुमिरन व ध्यान के अभ्यास में कमी आ जाती है । मन ठीक से नहीं लगता है । मन में तरह तरह की हिलोरें उठती रहती हैं । और तरह तरह की विघ्न बाधायें आती रहती हैं । यह हालत एक के बाद दूसरी । दूसरी के बाद तीसरी । यानी एक के बाद एक लगातार आती ही रहती हैं । भजन ध्यान का साधन बनता बिगडता रहता है ।
उत्तर - जब तक श्री सदगुरू देव जी महाराज की कृपा नहीं होगी । तब तक भजन । सुमिरन । ध्यान में रस या आनन्द नहीं आयेगा । साधक के मन में भजन, ध्यान के लिये बेकली व तडप आवश्यक है । जिससे रस और आनन्द के लिए भूख पैदा हो । भजन और ध्यान के लिए भूख पैदा होना ही आगे का रास्ता चलना है । यदि उतने से आनन्द में तृप्ति हो जाती है । तो फ़िर उसके लिये आगे का रास्ता रूक जाता है । अत: ऐसी दशा में जब विघ्न उत्पन्न हो । तो उसके लिये विरह तथा तडप उत्पन्न होती है । ऐसी दशा में अभ्यासी को घबराना नहीं चाहिये । और न ही निराश होना चाहिये । इस दशा में श्री सदगुरू देव जी महाराज के दया की आशा रखकर खूब लगन से भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान नियमित नियमानुसार करते रहना चाहिये । इससे मालिक की दया व कृपा अवश्य ही होती है ।

महापुरूषों ने यह बताया है कि साधक जितना रास्ता चलता है । और परमार्थ पथ पर अग्रसर होता जाता है । उतनी ही अधिक विघ्न बाधायें सामने आती हैं । नित्य नयी तरंगे लेकर काम । क्रोध । लोभ । मोह । माया तथा अहंकार के रूप में विघ्न आते हैं । अत: इनसे बचने के लिये केवल एकमात्र सहारा श्री सदगुरू भगवान का ही रह जाता है । अर्थात श्री सदगुरू देव जी महाराज की दया का सहारा लेकर इन विघ्न बाधाओं को काटते रहना चाहिये । श्री सदगुरू देव जी महाराज की दया से साहस और पुरूषार्थ के साथ चलकर श्री सदगुरू देव महाराज की कृपा से धीरे धीरे माया मोह के प्रभाव पर विजय पाना चाहिये । साधक एक न एक दिन सफ़लता प्राप्त कर ही लेगा ।
ऐसी धुन गुरू में लगे । जैसे तन में प्रान । एक पलक बिसरूं नहीं । हे परिपूरण काम ।
बिना श्री सदगुरू देव जी महाराज की कृपा व दया के काम । क्रोध । लोभ । मोह । मोह । माया । अहंकार से लडना सम्भव नहीं है । श्री सदगुरू देव जी महाराज की दया या सम्बल लिये बिना साधक आगे नहीं बढ सकता है । ऐसा होने से साधक के मन में मालिक के प्रति प्रेम, दीनता और आश्रय बढते जाते हैं । और जब श्री सदगुरू की दया से विघ्न कटने लग जाते हैं । तो प्रभु प्रेम विशेष रूप से उभरने लगता है । जिसके फ़ल स्वरूप साधक तीवृता से परमार्थ पथ पर बढने लगता है । उसका मन मानस स्वच्छ होने लगता है । और उसकी बढत इस ढंग से होने लगती है । जिससे वह इस माया देश से ऊपर उठकर ऊंचे देश यानी दयाल देश का वासी बन जाता है । यह सब कुछ हमारे 


श्री सदगुरू देव जी महाराज की कृपा व दया की बख्शीश या देन है ।
नियम निभाये दास ये । प्रभु दीजो यही आशीष । मेरे दामन में भरो । प्रभु दया की बख्शीश ।
जो साधक श्री सदगुरू के स्वरूप को अगुआ करके चलेगा । यानी श्री सदगुरू देव जी महाराज का आश्रय लेकर कोई भी कार्य करेगा । उसे प्रभु की कृपा से विघ्न बाधायें बहुत ही कम असर करेंगी । यदि माया अपने दल बल का थोडा बहुत वेग दिखायेगी । तो भी श्री सदगुरू देव जी महाराज अपनी दया से अपने शिष्य के ऊपर आई विघ्न बाधाओं का शीघ्र निवारण कर देंगे । इस प्रकार साधक अपने श्री सदगुरू देव महाराज पर आश्रित रहकर भजन । सुमिरन । ध्यान तथा भक्ति की साधन करता है । तथा सदा अपने मन को उनके श्री चरण कमलों में लवलीन रखता है । उससे माया भी डरती है । क्योंकि वह जानती है कि यहां मेरा वश नहीं चलेगा । इसलिये सभी साधकों को सीख दी जाती है कि कोई भी कार्य, चाहे सामाजिक कार्य हो । या आध्यात्मिक कार्य । सदा सर्वदा श्री सदगुरू देव महाराज को आगे रखकर ही करोगे । तो सदा सफ़लता प्राप्त करते रहोगे ।
गुरू अतिरिक्त और नहीं ध्यावे । गुरू सेवा रत शिष्य कहावे ।
इस तरह से अपने इष्ट देव पर न्यौछावर हों । तब वे कृपालु, दयालु अपने वह प्रेमाभक्ति देते हैं । जो सारे सुखों का मूल है । जब हम उन पर अपने आपको कुर्बान कर देते हैं । हम पर उन्हें पूर्ण विश्वास हो जाता है  कि यह हमारी

हर आज्ञा का पालन करेगा । तब वे अपने सेवा का अवसर प्रदान करते हैं । अत: हमें पूर्ण रूपेण श्री सदगुरू देव भगवान की श्री चरण शरण में अर्पित होना चाहिये । तभी तो लोग कहते हैं कि
न हमने हंस के पाया है । न हमने रो के पाया है । जो कुछ भी हमने पाया है । श्री सदगुरू का हो के पाया है ।
बिना श्री सदगुरू देव जी महाराज की कृपा के साधक के अन्दर भजन । सुमिरन । ध्यान व भक्ति की प्रक्रिया यानी आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो पाती । जिन साधक जिज्ञासु पर श्री सदगुरू देव जी महाराज की महती कृपा होती है । उनको गुरू के प्रेम की अमूल्य निधि प्राप्त हो जाती है । उन्हें उसको बनाये रखने के लिये भजन । सुमिरन । ध्यान का नियमित अभ्यास नियमानुसार करते रहना चाहिये । साधक को इसे बनाये रखने के लिये नियमित अभ्यास करना अति आवश्यक है । जब कभी भजन । सुमिरन । ध्यान करते समय ध्यान में रूकावट पडे । तो घबराना नहीं चाहिये । मालिक की दया का सहारा लेकर बार बार कोशिश पर कोशिश जारी रखे रहना चाहिए । ऐसा करने से मालिक की दया से भजन, सुमिरन व ध्यान होने लग जायेगा । और रस व आनन्द भी मिलने लगेगा । यही तो श्री सदगुरू की दया का प्रताप है ।
श्री सदगुरू ने अति दया कर । दिया नाम का दान । जपे जो श्रद्धा भाव से । पूरण होवें सब काम ।
भजन में जब सांसारिक विचार आवे । तो भरसक उन्हें हटाकर अपने मन को भजन । सुमिरन । ध्यान में

लगाना चाहिये । यदि सांसारिक विचार न हटें । तो मालिक के भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान में मन को घुमा फ़िरा कर लगाते रहना चाहिये । यदि इतना करने पर भी मन न लगे । तो मालिक से दीन भाव से प्रार्थना करें कि - हे मालिक ! मेरा तन, मन, धन सब आपका है । हे मालिक ! मेरे मन को अपने चरणों की प्रीति की डोर मे बांध कर अपने साथ हमेशा जोडे रहिये । और मेरा मन भजन, सुमिरन, ध्यान के रस में हमेशा हमेशा सराबोर किये रहिये । इससे मेरे मन में शान्ति व आनन्द प्राप्त हो जायेगा ।
माया और भक्ति दोनों इकट्ठी नहीं रह सकतीं । यह मेरा दिल मालिक का मन्दिर है । इष्टदेव का उपासना स्थल है । इसी उपासना स्थल में मालिक के नाम का भजन, मालिक के स्वरूप का ध्यान करें । और इसी भजन और ध्यान के रस में सदा डूबे रहें । यह श्री सदगुरू महाराज की महती दया है । और सभी साधकों को इसे बनाये रखने के लिये भजन भक्ति का अभ्यास करना अति आवश्यक है । ऐसा करने से शान्ति का अनुभव होता है । ऐसी दशा में जितनी देर तबियत चाहे । उतनी देर भजन ध्यान करता रहे । और मन में शान्ति की भावना लेकर उठे ।
सन्त सदगुरू जीवों के परम हितैषी होते हैं । वे संसार में आकर सदा परमार्थ एवं परोपकार में संलग्न रहते हैं । और अपने भक्तों को भक्ति की सच्ची दात प्रदान कर उनके दुख, कष्ट को हरते हैं । उनकी आत्मा का कल्याण करते हैं । उन्हें चौरासी 84 के चक्कर से मुक्ति दिलाते हैं । अपने सुकोमल तन पर अनेकों कष्ट सहन करके भी वे सदा भक्तों की भलाई करने में सदा लगे रहते हैं ।
जीवों के कल्याण हित । निरत रहे दिन रैन । पावन तन पर कष्ट सहें । देवें सुख और चैन ।


सन्तों महापुरूषों का कहना है- परमारथ के कारने । सन्त लिया औतार ।
सन्त लिया औतार । जगत को राह चलावैं । भक्ति करैं उपदेश । ज्ञान दे नाम सुनावैं ।
प्रीत बढावैं जगत में । धरनी पर डोलौं । कितनौ कहे कठोर वचन । वे अमृत बोलौं ।
उनको क्या है चाह । सहत हैं दुख घनेरे । जीव तारन के हेतु । मुलुक फ़िरते बहुतेरे ।
पलटू सदगुरू पायके । दास भया निरवार । परमारथ के कारने । सन्त लिया औतार ।
73  प्रश्न - अभ्यास करते करते यानी भजन, ध्यान करते करते किसी किसी को नींद आने लगती है । और अभ्यासी सो जाता है । किसी किसी को तो गहरी नींद में नाक बजने लग जाती है । जागने पर सोचता है कि बडी गहरी समाधि लग गयी है । क्या यह सचमुच समाधि की हालत होती है ?
उत्तर - यह धोखा है । भजन । सुमिरन । ध्यान में जब नींद आने लग जाती है । तो वह एक प्रकार का विघ्न है । इसे तन्द्रा कहते हैं । और यह जागृत तथा सोने के बीच की हालत है । प्रारम्भिक अभ्यास में यह दशा किसी किसी को होती है । जब नींद आती मालूम पडे । तो भजन करना छोडकर उठ जाय । और कुछ देर टहल घूम ले । यदि आवश्यकता समझे । तो मुंह हाथ धोकर । कुल्ला कर ले । सिर धो ले । फ़िर अभ्यास में बैठ जाय । ज्यादा खाना खाकर भजन । सुमिरन । ध्यान की साधना में बैठने से ऐसा अक्सर होता है । खाली पेट भजन । सुमिरन । ध्यान में आन्तरिक स्मरण करता रहे । तो ऐसा अभ्यास

करते रहने से कुछ ही समय में सारी विघ्न बाधायें दूर हो जायेंगी ।
इसके अतिरिक्त तीन प्रकार के विघ्न और भी हैं । जो अभ्यासी के मार्ग में बाधा डालते हैं । 1 विक्षेप 2 कषाय और 3 रसा स्वाद ।
1 विक्षेप - जब भजन और ध्यान में मन लगता है । तब कभी कभी ऐसा होता है कि झटके के साथ एकदम चित्त उधर से हट जाता है । जैसे किसी ने अचानक आकर पुकारा । या आवाज दी । या हाथ से हिलाकर उठाना चाहा । या मन में अचानक कोई सांसारिक तरंगे ऐसी उठीं । जिसके कारण चित्त चलायमान हो गया । या कोई कीडा । मच्छर । चींटी इत्यादि ने काट लिया । यह केवल कुछ उदाहरण हैं । जिससे विक्षेप का अर्थ स्पष्ट हो जाय । इस प्रकार की अनेक विघ्न बाधायें विक्षेप के अन्तर्गत आती है । और इसके कारण अभ्यासी भजन और ध्यान को एकदम छोड देता है । इसका उपाय यह है कि इन कारणों की पहले से रोक थाम करे । भजन, ध्यान में बैठने के लिये साफ़ सुथरी जगह पर बैठ कर भजन ध्यान करे । घर परिवार के लोगों को समझा दे कि भजन ध्यान के समय कोई जोर से न बोले । इशारे इशारों से काम ले लें । बहुत जरूरी पडने पर धीरे धीरे बोलकर काम चलावें । जिससे कि अभ्यासी के भजन, ध्यान में बाधा न पडे । जब तक भजन ध्यान की एकाग्रता Concentration में परिपक्वता नहीं आ जाती । तब तक यह दशा रहती है । अभ्यास करते करते जब एकाग्रता में 


दृणता आ जाती है । तब इस प्रकार के विघ्न बाधायें नहीं डालते । फ़िर चाहे कोई सिर पर ढोल बजाता रहे । अभ्यासी के चित्त को डिगा नहीं सकता । महर्षि वाल्मीकि के ऊपर दीमकों ने घर बना लिया था । रामकृष्ण परमहंस जब पंचवटी में ध्यान करने बैठते थे । तो मच्छर उनके शरीर पर इस प्रकार लिपट जाते थे कि जैसे वे कोई कपडा ओढे हों ।
पल पल जो सुमिरन करे । मन में श्रद्धा धार । आधि व्याधि नासे सकल । पावै सुख अपार ।
2  कषाय - कभी भजन व ध्यान के समय अभ्यासी के मन में ऐसे विचार उठते हैं । या ऐसे दृश्य सामने आते हैं । जिन्हें उसने वर्तमान जन्म में न देखा है । न सुना है । और न जिनका कोई आधार है । ऐसे विचार पूर्ण जन्मों के कर्मों के परिणामस्वरूप होते हैं । और मन की गुनावन से पैदा होते हैं । बिना थोडी देर अपना प्रभाव दिखाये यह नहीं जाते हैं । जो अभ्यासी गुरू को आगे रखता है । और प्रेम तथा विरह को दृढ़ता से पकडकर चलता है । उसे इस प्रकार के विघ्न कम सताते हैं । जब कभी ऐसे विचार आकर घेरें । उस समय अभ्यासी को चाहिये कि भजन के साथ साथ श्री सदगुरू भगवान के स्वरूप का ध्यान करे । कुछ ही समय में यह विचार हट जायेंगे । और भजन, ध्यान के आनन्द का रस मिलने लग जायेगा । साथ ही साधक का मन उत्साहित होकर और ज्यादा से ज्यादा समय भजन । भक्ति व सेवा । पूजा । दर्शन में लगने लगता है । और 


आनन्दित भी होता है । तथा अपने श्री सदगुरू देव जी महाराज को प्रसन्नचित्त व आनन्द विभोर करके सन्तुष्ट कर लेता है । और जब श्री सदगुरू सन्तुष्ट हो जाते हैं । तो वे अपने शिष्य व साधक को अपने दया से मोक्ष प्रदान कर देते हैं ।
गुरू नाम का सुमिरन किये । जन्म यह निश्चय जीता संवर । मोक्ष मिल जाता दास को । दया का हाथ होता सर ।
3  स्वाद से आशय यह है कि जो थोडा बहुत रस भजन व ध्यान में अभ्यासी को प्रारम्भिक दशा में मिलता है । उसे पाकर कभी कभी साधक बहुत मग्न हो जाता है । और भजन, ध्यान के आनन्द में विभोर होकर तृप्त हो जाता है । सन्तुष्ट हो जाता है । इसी सन्तुष्टि के फ़लस्वरूप साधक का मन भजन, सुमिरन, ध्यान में ज्यादा से ज्यादा लगने लगता है । जिससे उसे समय का ज्ञान नहीं रह पाता । उसी भजन, भक्ति में विभोर मन सदगुरू की कृपा व दया का पात्र बन जाता है । जब ऐसी दशा होती है । तो साधक को चाहिये कि अपने साधना को बढाता जाय । तथा आध्यात्मिक चढाई धीरे धीरे चढता जाय । ऐसा करने से धीरे धीरे सारी विघ्न बाधायें समाप्त हो जाती हैं । और भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान में मग्न होकर मन श्री सदगुरू की दया का अमृत पान कर मस्त व मगन हो उठता है । ये सब श्री सदगुरू की कृपा की ही देन है । ऐसी स्थिति में श्री सदगुरू की चरण शरण ग्रहण किये रहे ।
सन्त सदगुरू के जो उपकार हैं । उनका बदला जीव क्या दे सकता है ? संत सदगुरू के उपकारों के बदले यदि जीव तीन लोक की सम्पदा भी भेंट कर दे । तो भी वह मन में यह सोचकर सकुचाता है कि मैंने कुछ भी तो भेंट नहीं किया । कथन है कि -
सदगुरू के उपकार का । बदला दिया न जाय । तीन लोक की सम्पदा । भेंटत मन सकुचाय ।
- ये शिष्य जिज्ञासा से सम्बन्धित प्रश्नोत्तरी श्री राजू मल्होत्रा द्वारा भेजी गयी है । आपका बहुत बहुत आभार ।

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