रविवार, जनवरी 29, 2012

और खाओ माँस मछली..फ़िर देखो होता है क्या ?

मांस अहारी मानई । प्रत्यक्ष राक्षस जानि । ताकी संगति मति करै । होइ भक्ति में हानि ।
मांस मछलिया खात हैं । सुरापान से हेत । ते नर नरकै जाहिंगे । माता पिता समेत ।
मांस मांस सब एक है । मुरगी हिरनी गाय । जो कोई यह खात है । ते नर नरकहिं जाय ।
जीव हनै हिंसा करै । प्रगट पाप सिर होय । निगम पुनि ऐसे पाप तें । भिस्त गया नहिं कोय ।
तिल भर मछली खाय के । कोटि गऊ दै दान । काशी करौत ले मरै । तौ भी नरक निदान ।
बकरी पाती खात है । ताकी काढी खाल । जो बकरी को खात है । तिनका कौन हवाल ।
अंडा किन बिसमिल किया । घुन किन किया हलाल ।  मछली किन जबह करी । सब खाने का ख्याल ।
मुल्ला तुझै करीम का । कब आया फरमान । घट फोरा घर घर दिया । साहब का नीसान ।
काजी का बेटा मुआ । उर मैं सालै पीर । वह साहब सबका पिता । भला न मानै बीर ।
पीर सबन को एक सी । मूरख जानैं नाहिं । अपना गला कटाय कै । भिश्त बसै क्यों नाहिं ।
जोरी करि जबह करै । मुख सों कहै हलाल । साहब लेखा मांग सी । तब होसी कौन हवाल ।
जोर कीयां जुलूम है । मागै जबाब खुदाय । खालिक दर खूनी खडा । मार मुही मुँह खाय ।
गला काटि कलमा भरै । कीया कहै हलाल । साहब लेखा मांगसी । तब होसी कौन हवाल ।
गला गुसा कों काटिये । मियां कहर कौ मार । जो पांचू बिस्मिल करै । तब पावै दीदार ।
कबिरा सोई पीर हैं । जो जानै पर पीर । जो पर पीर न जानि है । सो काफिर बेपीर ।
कहता हूं कहि जात हूं । कहा जो मान हमार । जाका गला तुम काटि हो । सो फिर काटै तुम्हार ।
हिन्दू के दया नहीं । मिहर तुरक के नाहिं । कहै कबीर दोनूं गया । लख चैरासी मांहि ।
मुसलमान मारै करद सों । हिंदू मारे तलवार । कह कबीर दोनूं मिल । जावैं यम के द्वार ।
पानी पृथ्वी के हते । धूंआं सुनि के जीव । हुक्के में हिंसा घनी । क्यों कर पावै पीव ।
छाजन भोजन हक्क है । और दोजख देइ ।
गऊ अपनी अम्मा है । इस पर छुरी न बाह । गरीबदास घी दूध को । सब ही आत्म खाय ।
दिन को रोजा रहत हैं । रात हनत हैं गाय । यह खून वह बंदगी । कहुं क्यों खुशी खुदाय ।
खूब खाना है खीचडी । मांहीं परी टुक लौन । मांस पराया खाय कै । गला कटावै कौन ।
मुसलमान गाय भखी । हिन्दु खाया सूअर । गरीबदास दोनों दीन से । राम रहिमा दूर ।
जीव हिंसा जो करत हैं । या आगै क्या पाप । कंटक जूनि जिहान में । सिंह भेढिया और सांप ।
आप कबीर अल्लाह हैं । बख्सो अब की बार । दासगरीब शाह कुं । अल्लाह रूप दीदार ।

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