गुरुवार, जनवरी 05, 2012

ईश्वर है इसका क्या प्रमाण है ?

22  प्रश्न - स्वामी जी ईश्वर है । या नहीं । इसका क्या प्रमाण है ?
उत्तर - सन्त महापुरूषों का कहना है कि ईश्वर है । और हम लोगों ने उन्हें पाया है । तुम लोग खूब भजन । सुमिरन । ध्यान । नियमित नियमानुसार करोगे । तो तुम लोग भी पाओगे । सन्तों का कहता है कि भांग भांग कहने से नशा नहीं चढता । भांग लाओ । पी लो । तब कुछ नशा चढेगा । केवल भगवान या ईश्वर ईश्वर कहने से नहीं होगा । भजन । सुमिरन । ध्यान की साधना करो । फ़िर उनकी कृपा की अपेक्षा करो । समय पर उनकी कृपा । तथा उनक दर्शन अवश्य पाओगे ।
23  प्रश्न - हे स्वामी जी महाराज ! जप करते करते कभी कभी मन शून्य 0 हो जाता है । यह क्यों ?
उत्तर - पतंजलि ने कहा है । यह शून्यपन 0 विघ्न है । श्री सदगुरू महाराज जी के बतलाये हुए नाम का भजन । सुमिरन । ध्यान । निरन्तर करते रहने से ध्यान में प्रगाढता आती है । प्रगाढता आने से प्रत्यक्ष अनुभूति हो जाती है । और अनुभूति हो जाने से समाधि trance हो जाती है । समाधि के बाद आनन्द का प्रभाव बहुत सम्य तक बना रहता है । श्री स्वामी जी महाराज कहा करते थे कि - यह भक्ति । भजन का आनन्द जीवन भर बना रहता है । कभी भी समाप्त नहीं होता ।
श्री स्वामी जी महाराज 1 शिष्य को समझा रहे थे । परन्तु बालक जान कर थोडा सा एवायड कर रहे थे । फ़िर भी 


मालिक तो भक्ति की खान होते हैं । जब भक्ति की खान से फ़व्वारा निकला । तो अपने शिष्य को भक्ति का खान बना दिया । और फ़िर शिष्य के कानों में श्री सदगुरू का नाम पडते ही उस शिष्य के भीतर से मानों प्रेम का फ़ुहारा उठने लगा । साधु ही साधु को पहचान सकता है । साधना करके उच्च अवस्थ प्राप्त किये बिना । उस अवस्था के व्यक्ति को पहचाना नहीं जा सकता । हीरे का मूल्य क्या सब्जी बेचने वाला लगा सकता है ?
24  प्रश्न - स्वामी जी ! कुछ महात्माओं और भक्तों का कहना है कि निर्जन स्थान में गुप्त रूप से रोते रोते मालिक को पुकारना चाहिये । चाहे 1 वर्ष तक हो । या 3 माह हो । या 3 दिन हो । साधु संग हो । निर्जन स्थान हो । जैसे नदी का किनारा । धार्मिक स्थान । बाग बगीचा । उसमें बैठकर भजन । ध्यान करना चाहिये । इन दोनों में किस पर अधिक जोर देना हमें उचित है ।


उत्तर - भजन । ध्यान दोनों एक साथ करना होगा । एकान्त में बैठ कर भजन । ध्यान करने से मन सहज ही अन्तर्मुखी हो जाता है । व्यर्थ की चिन्तायें कम हो जाती है । थोडी उन्नति हुए बिना पूर्ण निर्जन स्थान का प्रयोग नहीं किया जा सकता । बहुत लोग एकदम नि:संग होने की कोशिश करने से पागल हो जाते हैं । कोई अनिष्ट हो जाता है । भजन । सुमिरन । ध्यान करते करते कुछ अभ्यास होने पर ही एकान्त वास करें । भजन । ध्यान करते करते समाधिस्थ हुए बिना । श्री सदगुरू को अन्दर बसाये बिना । या सदगुरू के चिन्तन में लीन हुए बिना । मन ठीक तरह से नि:संग नहीं होगा । साधु सन्तों की संगति की भी सदैव आवश्यकता पडती है ।
1 दिन 1 व्यक्ति श्री स्वामी जी महाराज के पास आया । उन्हें देखा । वे चुपचाप अपने में अन्दर लीन हैं । उन्हें देखकर वह सोचने लगा - ये बात नहीं करते । इनके पास आने से क्या लाभ ? यह सोचकर वह उस दिन वापस चला गया । और 1 दिन आकर उनके पास कुछ देर बैठा रहा । उस दिन उसने देखा कि स्वामी जी अन्दर यानी अपने मन ही मन किसी से बातें कर रहे हैं । कभी रो 


रहे हैं । तो कभी हंस रहे हैं । उनका यह भाव देखकर उस व्यक्ति ने उस दिन कहा - जो आज सीखा है । वह हजारों पुस्तकें पढकर भी नहीं सीखा जा सकता है । श्री सदगुरू भगवान में जब ऐसी व्याकुलता आयेगी । तभी उनके दर्शन होंगे । और तभी भजन । सुमिरन । पूजा । दर्शन । ध्यान की साधना का आनन्द आएगा ।
25  प्रश्न - स्वामीजी ! ध्यान में बैठने से कभी कभी मन खूब स्थिर होता है । और कभी कभी हजार चेष्टा करने पर भी स्थिर नहीं हो पाता है । सिर्फ़ इधर उधर दौडता रहता है ।
उत्तर - हां । ऐसा होता है । किन्तु यह पहले पहल ही होता है । समुद्र में ज्वार भाटा होता है । ठीक उसी प्रकार सभी चीजों का ज्वार भाटा होता है । साधना भजन में भी ज्वार भाटा है । इसके लिये कुछ सोचना मत । कमर कस कर नियम से लगे रहना चाहिये । श्री सदगुरू महाराज के प्रति एकनिष्ठ भक्ति भाव से साधना । भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान । कुछ समय तक नियमित रूप से किया जाए । तो ज्वार भाटा फ़िर नहीं उठेगा । मन स्थिर होने लगेगा । तब ध्यान की धारा अविरल प्रवाहित होने लगेगी ।
आसन पर बैठते ही एकदम जप ध्यान आरम्भ करना ठीक नहीं है । पहले विचार पूर्वक श्रद्धा भाव से मन को

बाहर की दुनियां से समेटना चाहिये । फ़िर अपने श्री सदगुरू देव जी महाराज को । आप जहां बैठे हैं । वहीं से मन ही मन साष्टांग दण्डवत प्रणाम करना चाहिये । श्री स्वामी जी महाराज से हाथ जोडकर प्रार्थना करना चाहिये कि - हे मेरे दयासागर । परम दयालु । श्री स्वामी जी ! मेरे मालिक । मेरा मन ध्यान की तरफ़ अग्रसर कीजिये । मन की भटकन को छुडाइये प्रभु । फ़िर उसके बाद मालिक के स्वरूप का ध्यान, भजन प्रारम्भ करना चाहिये । कुछ दिन ऐसा करने पर मन धीरे धीरे स्थिर हो जायेगा ।
जब देखो कि मन थोडा स्थिर हो रहा है । तो उस समय काम कोई भी करो । सेवा करते रहो । लेकिन मन मालिक की तरफ़ लगाये रखो । जहां जरा भी सेवा से अवकाश मिले । तुरन्त भजन । सुमिरन । ध्यान करना चाहिये। जब अच्छा न लगे । मन स्थिर न हो । उस समय मालिक की श्री मुख वाणी का स्मरण करते रहना चाहिये । मालिक को याद करते रहना चाहिये । और उनका भजन गाना चाहिये । भजनादि गुनगुनाने से भी मन लगता है । नियमित नियमानुसार चिन्तन । मनन । और मालिक का दर्शन । आरती । पूजा । भजन । त्यौहार आदि की अदभुत छवि के ख्याल की सहायता से । मन को स्थिर करने की चेष्टा करे । मन तुरन्त स्थिर 


होने लगेगा । प्रतिक्षण संघर्ष करना होगा । मन कहो । बुद्धि कहो । चाहे इन्द्रिय कहो । संघर्ष करने से सभी वश में आ जाते हैं । श्री स्वामी जी महाराज ने कहा है - संघर्ष ही है जीवन । श्री गुरूदेव ने कहा है - कांटो का गम नहीं है । समरथ है गुरू हमारा ।
26 प्रश्न - श्री स्वामी जी ! क्या भजन । सुमिरन का ढोल नहीं पीटना चाहिये ?
उत्तर - नहीं । कदापि नहीं । इससे अनिष्ट होता है । विभिन्न लोग विभिन्न प्रकार की बातें हंसी उडाते हैं । फ़िर यह ठीक भी नहीं है । नाना प्रकार की बातें करके लोग मन को संदिग्ध और चंचल बना देते हैं । तथा साधन में विघ्न पैदा करते हैं । यथार्थ साधक कैसा होता है । जानते हो ? यथार्थ साधक मच्छरदानी के अन्दर सोया रहता है । सब लोग सोचते हैं कि - सो रहा है । पर वह रात सुमिरन । ध्यान करके बिता देता है । सबेरे जब उठता है । तो लोग समझते हैं कि वह सोकर उठा है ।
पहली उमृ में ही खूब साधना । जप । ध्यान । भजन । सुमिरन । पूजा । दर्शन । सेवा । दान कर श्री सदगुरू देव जी महाराज के दर्शन । ध्यान का आनन्द पा लेना चाहिये । 1 बार जिसने स्वाद पा लिया । वह फ़िर कहां जाएगा

। उसका सिर काट लेने पर भी वह पुन: अपने भगवान । अपने प्रभु । अपने मालिक को कभी छोड नहीं सकता । अपने मालिक से मिलने को बेचैन रहता है । साधना । भजन का सुन्दर समय है । सन्धि क्षण । और गम्भीर रात्रि । साधारणतया मनुष्य वह समय व्यर्थ गवां देता है । जो लोग खूब नींद लेना चाहते हैं । यदि वे पहले पहल दिन में सो लें । और रात्रि में जागें । तो वह भी अच्छा है । रात को 3 लोग जागते हैं - 1 योगी । 2 भोगी । और 3 चोर । रात की नींद योगी । साधु के लिये नहीं है । यह बात श्री स्वामी जी महाराज अपने श्री मुख से बराबर कहा करते हैं ।
ऐसे प्रेमी भक्त श्री सदगुरू देव जी महाराज के सानिध्य में रहते हैं । और सदगुरू सभी को उपदेश ध्यान । धारणा । भजन । सेवा सिखलाते हैं । विभिन्न प्रकार की सेवायें करवा कर अपने शिष्य को हर प्रकार से संवारते और सम्हालते हैं ।
27  प्रश्न - क्या श्री सदगुरू देव भगवान का नाम लेने से मन शुद्ध होता है ?
उत्तर - अवश्य शुद्ध होता है । श्री सदगुरू देव जी महाराज के नाम का भजन । सुमिरन । दर्शन । सेवा । पूजा । ध्यान करने से तन और मन दोनों शुद्ध हो जाते हैं । श्री सदगुरू स्वामी जी के नाम के भजन में ऐसा विश्वास होना चाहिये कि मुझे अब डर क्या । मेरा अब बन्धन कहां । श्री सदगुरू जी से नाम दीक्षा लेकर मैं अब अमर हो गया हूं । इस तरह का अटल विश्वास रखकर मैं अब अमर हो गया हूं । इस तरह का अटल विश्वास रखकर साधना करनी चाहिये । निश्चित ही भजन । सुमिरन से तन । मन शुद्ध और शान्त हो जायेगा ।
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ये शिष्य जिज्ञासा की सुन्दर प्रश्नोत्तरी श्री राजू मल्होत्रा जी द्वारा भेजी गयी है । आपका बहुत बहुत आभार ।

1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

आपको हमारा आत्मिक प्रणाम स्वीकार्य हो।
आपके लेख तपती दोपहरी मेँ शीतल छाँव कीतरह हैँ।
आज के समय मेँ हमारे कुछ भाइयोँ को तो ईश्वर मेँही विश्वाश नहीँ है!कुछ भाइयोँ को कहीँ कुछ पढ़सुन कर थोड़ा बहुत विश्वाश हो भी जाता है,तो साँसारिक मित्थ्या सुखो मे पड़कर भटक जाते हैं।
जितनी लगन से मेहनत हम धन संचय के लिए करते हैँ,हम उतनी भी नहीँ करना चाहते?
कबीर साहब का एक दोहा याद आ रहाहै,
कामी, क्रोधी,लालची।इनते भक्ति न होय।भक्ति करै कोइ सूरमा। जाति वर्ण कुल खोय।
जय श्री सतगुरुवे नमः

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