शनिवार, नवंबर 26, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 40


गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च । आत्मा न गंता नागंता किमेनमनुशोचसि । 15-9 
गुणों से निर्मित । यह शरीर स्थिति । जन्म और मरण को प्राप्त होता है । आत्मा न आती है । और न ही जाती है । अतः तुम क्यों शोक करते हो । 9
देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः । क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः । 15-10 
यह शरीर । सृष्टि के अंत तक रहे । अथवा । आज ही । नाश को प्राप्त हो जाये । तुम तो चैतन्य स्वरुप हो ।  इससे तुम्हारी क्या हानि या लाभ है । 10
त्वय्यनंतमहांभोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः । 15-11
अनंत महासमुद्र रूप तुम में । लहर रूप । यह विश्व । स्वभाव से ही । उदय और अस्त । को प्राप्त होता है । इसमें तुम्हारी । क्या वृद्धि या क्षति है । 11
तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत । अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना । 15-12 
हे प्रिय ! तुम केवल चैतन्य रूप हो । और यह विश्व । तुमसे अलग नहीं है । अतः किसी की किसी से । श्रेष्ठता या निम्नता । की कल्पना । किस प्रकार की जा सकती है । 12
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 39


 एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि । कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहंकार एव च । 15-13 
इस अव्यय । शांत । चैतन्य । निर्मल आकाश में । तुम अकेले ही हो । अतः तुममें जन्म । कर्म और अहंकार की कल्पना किस प्रकार की जा सकती है । 13
यत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे । किं पृथक भासते स्वर्णात कटकांगदनूपुरम । 15-14 
तुम एक होते हुए भी । अनेक रूप में । प्रतिबिंबित होकर । दिखाई देते हो । क्या स्वर्ण कंगन । बाज़ूबन्द और पायल से अलग दिखाई देता है । 14
अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति संत्यज । सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव । 15-15 
यह मैं हूँ । और यह मैं नहीं हूँ । इस प्रकार के भेद को त्याग दो । सब कुछ आत्मस्वरूप तुम ही हो । ऐसा निश्चय करके । और कोई संकल्प न करते हुए । सुखी हो जाओ । 15
तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः । त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन । 15-16 
अज्ञानवश तुम ही । यह विश्व हो । पर ज्ञान दृष्टि से । देखने पर । केवल एक तुम ही हो । तुमसे अलग कोई । दूसरा संसारी । या असंसारी । किसी भी प्रकार से नहीं है । 16
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 38


भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चयी । निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किंचिदिव शाम्यति । 15-17 
यह विश्व केवल भृम ( स्वप्न की तरह असत्य ) है । और कुछ भी नहीं । ऐसा निश्चय करो । इच्छा और चेष्टा रहित हुए । बिना कोई भी । शांति को प्राप्त नहीं होता है । 17
एक एव भवांभोधावासीदस्ति भविष्यति । न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृत्यकृत्यः सुखं चर । 15-18 
एक ही भवसागर ( सत्य ) था । है । और रहेगा । तुममें न मोक्ष है । और न बंधन । आप्त काम होकर सुख से विचरण करो । 18
मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय । उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे । 15-19 
हे चैतन्यरूप ! भाँति भाँति के संकल्पों । और विकल्पों से । अपने चित्त को । अशांत मत करो । शांत होकर । अपने आनंद रूप में । सुख से स्थित हो जाओ । 19
त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किंचिद् हृदि धारय । आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि । 15-20 
सभी स्थानों से अपने ध्यान को हटा लो । और अपने हृदय में कोई विचार न करो । तुम आत्मरूप हो । और मुक्त ही हो । इसमें विचार करने की क्या आवश्यकता है । 20
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।




अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 37


जनक उवाच -  प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादाद भावभावनः । निद्रितो बोधित इव क्षीणसंस्मरणो हि सः । 14-1
जनक बोले -  जो स्वभाव से ही विचार शून्य है । और शायद ही कभी कोई इच्छा करता है । वह पूर्व स्मृतियों से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है । जैसे कि नींद से जागा हुआ व्यक्ति अपने सपनों से । 1
 क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः । क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा । 14-2
 जब मैं । कोई इच्छा नहीं करता । तब मुझे धन । मित्रों । विषयों । शास्त्रों और विज्ञान से क्या प्रयोजन है । 2
 विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे । नैराश्ये बंधमोक्षे च न चिंता मुक्तये मम । 14-3
 साक्षी पुरुष रूपी । परमात्मा या ईश्वर को । जानकर मैं बंधन और मोक्ष से । निरपेक्ष हो गया हूँ । और मुझे मोक्ष की चिंता भी नहीं है । 3
अंतर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः । भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते । 14-4
आतंरिक इच्छाओं से रहित । बाह्य रूप में चिंता रहित । आचरण वाले । प्रायः मत्त पुरुष जैसे ही दिखने वाले प्रकाशित पुरुष अपने जैसे प्रकाशित पुरुषों द्वारा ही पहचाने जा सकते हैं । 4
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 36


जनक उवाच - अकिंचनभवं स्वास्थं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम । त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम । 13-1
जनक बोले - अकिंचन ( कुछ अपना न ) होने की सहजता केवल कौपीन पहनने पर भी मुश्किल से प्राप्त होती है । अतः त्याग और संग्रह की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 1
कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते । मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम । 13-2
शारीरिक दुःख भी कहाँ ( अर्थात नहीं ) हैं । वाणी के दुःख भी कहाँ हैं । वहाँ मन भी कहाँ है । सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 2
कृतं किमपि नैव स्याद इति संचिन्त्य तत्त्वतः । यदा यत्कर्तुमायाति तत कृत्वासे यथासुखम । 13-3
किये हुए किसी भी कार्य का वस्तुतः कोई अस्तित्व नहीं है । ऐसा तत्त्व पूर्वक विचार करके जब जो भी कर्त्तव्य है । उसको करते हुए सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 3
कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावा देहस्थयोगिनः ।  संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम । 13-4
शरीर भाव में स्थित योगियों के लिए कर्म और अकर्म रूपी बंधनकारी भाव होते हैं । पर संयोग और वियोग की प्रवृत्तियों को छोड़कर । सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 4
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 35


कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावा देहस्थयोगिनः ।  संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम । 13-4
शरीर भाव में स्थित योगियों के लिए कर्म और अकर्म रूपी बंधनकारी भाव होते हैं । पर संयोग और वियोग की प्रवृत्तियों को छोड़कर । सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 4
अर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या न शयनेन वा ।  तिष्ठन गच्छन स्वपन तस्मादहमासे यथासुखम । 13-5
विश्राम । गति । शयन । बैठने । चलने और स्वप्न में वस्तुतः मेरे लाभ और हानि नहीं हैं । अतः सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 5
स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा । नाशोल्लासौ विहायास्मदहमासे यथासुखम । 13-6
सोने में मेरी हानि नहीं है । और उद्योग । अथवा अनुद्योग में । मेरा लाभ नहीं है । अतः हर्ष और शोक की । प्रवृत्तियों को छोड़कर । सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 6
सुखादिरूपा नियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः । शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम । 13-7
सुख । दुःख आदि स्थितियों के क्रम से आने के नियम पर बार बार विचार करके । शुभ ( अच्छे ) और अशुभ ( बुरे ) की  प्रवृत्तियों को छोड़कर । सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 7


अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।



अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 34


जनक उवाच - कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः । अथ चिन्तासहस्तस्माद एवमेवाहमास्थितः । 12-1
जनक बोले - पहले मैं । शारीरिक कर्मों से । निरपेक्ष ( उदासीन ) हुआ । फिर वाणी से । निरपेक्ष ( उदासीन ) हुआ । अब चिंता से । निरपेक्ष ( उदासीन ) होकर । अपने स्वरुप में स्थित हूँ । 1प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः । विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः । 12-2
शब्द आदि । विषयों में । आसक्ति रहित होकर । और आत्मा के । दृष्टि का । विषय न होने के कारण । मैं निश्चल । और एकाग्र ह्रदय से । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 2
समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये । एवं विलोक्य नियमं एवमेवाहमास्थितः । 12-3
अध्यास ( असत्य ज्ञान ) आदि । असामान्य स्थितियों । और समाधि को । एक नियम के । समान देखते हुए । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 3
हेयोपादेयविरहाद एवं हर्षविषादयोः । अभावादद्य हे बृह्मन्न एवमेवाहमास्थितः । 12-4
हे बृह्म को । जानने वाले । त्याज्य ( छोड़ने योग्य ) और संगृहणीय से । दूर होकर । और सुख दुःख के । अभाव में । मैं अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 4
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।




अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 33


आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनं । विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः । 12-5
आश्रम । अनाश्रम । ध्यान और मन द्वारा । स्वीकृत । और निषिद्ध । नियमों को देखकर । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 5
कर्मानुष्ठानमज्ञानाद यथैवोपरमस्तथा । बुध्वा सम्यगिदं तत्त्वं एवमेवाहमास्थितः । 12-6
कर्मों के । अनुष्ठान रूपी । अज्ञान से । निवृत्त होकर । और तत्त्व को । सम्यक रूप से जानकर । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 6
अचिंत्यं चिंत्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ । त्यक्त्वा तदभावनं तस्माद् एवमेवाहमास्थितः । 12-7
अचिन्त्य के । सम्बन्ध में । विचार करते हुए भी । विचार पर ही । चिंतन । किया जाता है । अतः । उस विचार का भी । परित्याग करके । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 7
एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ । एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ । 12-8
जो । इस प्रकार से । आचरण करता है । वह कृतार्थ ( मुक्त ) हो जाता है । जिसका । इस प्रकार का । स्वभाव है । वह कृतार्थ ( मुक्त ) हो जाता है । 8
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।




अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 32


अष्टावक्र उवाच - भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी  । निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति । 11-1
अष्टावक्र बोले - भाव ( सृष्टि । स्थिति ) और अभाव ( प्रलय । मृत्यु ) रूपी विकार । स्वाभाविक हैं । ऐसा निश्चित रूप से । जानने वाला । विकार रहित । दुख रहित होकर । सुख पूर्वक । शांति को । प्राप्त हो जाता है । 1
ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी । अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते । 11-2
ईश्वर । सबका । सृष्टा है । कोई अन्य नहीं । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाले की । सभी । आन्तरिक इच्छाओं का । नाश हो जाता है । वह शांत पुरुष । सर्वत्र । आसक्ति रहित । हो जाता है । 2
आपदः संपदः काले दैवादेवेति निश्चयी । तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति । 11-3
संपत्ति ( सुख ) और विपत्ति ( दुःख ) का समय । प्रारब्धवश ( पूर्वकृत कर्मों के अनुसार ) है । ऐसा । निश्चित रूप से जानने वाला । संतोष । और निरंतर । संयमित इन्द्रियों से । युक्त हो जाता है । वह न । इच्छा करता है । और न शोक । 3
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।



अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 31


सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी । साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते । 11-4
सुख दुःख । और । जन्म मृत्यु । प्रारब्धवश ( पूर्वकृत कर्मों के अनुसार ) हैं । ऐसा । निश्चित रूप से जानने वाला । फल की इच्छा । न रखने वाला । सरलता से । कर्म करते हुए भी । उनसे लिप्त नहीं होता है । 4
चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी । तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः । 11-5
चिंता से ही । दुःख । उत्पन्न होते हैं । किसी । अन्य कारण से नहीं । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाला । चिंता से रहित होकर । सुखी । शांत । और सभी इच्छाओं से । मुक्त हो जाता है । 5
नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी । कैवल्यं इव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम । 11-6
न मैं । यह शरीर हूँ । और न यह । शरीर मेरा है । मैं ज्ञानस्वरुप हूँ । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाला । जीवन मुक्ति को । प्राप्त करता है । वह किये हुए ( भूतकाल ) और न किये हुए ( भविष्य के ) कर्मों का । स्मरण नहीं करता है । 6
आबृह्मस्तंबपर्यन्तं अहमेवेति निश्चयी । निर्विकल्पः शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः । 11-7
तृण से लेकर । बृह्मा तक । सब कुछ । मैं ही हूँ । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाला । विकल्प ( कामना ) रहित । पवित्र । शांत । और प्राप्त अप्राप्त से । आसक्ति रहित । हो जाता है । 7
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।



गुरुवार, नवंबर 17, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 16


जनक उवाच - कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः । अथ चिन्तासहस्तस्माद एवमेवाहमास्थितः । 12-1
जनक बोले - पहले मैं । शारीरिक कर्मों से । निरपेक्ष ( उदासीन ) हुआ । फिर वाणी से । निरपेक्ष ( उदासीन ) हुआ । अब चिंता से । निरपेक्ष ( उदासीन ) होकर । अपने स्वरुप में स्थित हूँ । 1
प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः । विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः । 12-2शब्द आदि । विषयों में । आसक्ति रहित होकर । और आत्मा के । दृष्टि का । विषय न होने के कारण । मैं निश्चल । और एकाग्र ह्रदय से । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 2समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये । एवं विलोक्य नियमं एवमेवाहमास्थितः । 12-3
अध्यास ( असत्य ज्ञान ) आदि । असामान्य स्थितियों । और समाधि को । एक नियम के । समान देखते हुए । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 3
हेयोपादेयविरहाद एवं हर्षविषादयोः । अभावादद्य हे बृह्मन्न एवमेवाहमास्थितः । 12-4
हे बृह्म को । जानने वाले । त्याज्य ( छोड़ने योग्य ) और संगृहणीय से । दूर होकर । और सुख दुःख के । अभाव में । मैं अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 4
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अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 15


हेयोपादेयविरहाद एवं हर्षविषादयोः । अभावादद्य हे बृह्मन्न एवमेवाहमास्थितः । 12-4
हे बृह्म को । जानने वाले । त्याज्य ( छोड़ने योग्य ) और संगृहणीय से । दूर होकर । और सुख दुःख के । अभाव में । मैं अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 4
आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनं । विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः । 12-5
आश्रम । अनाश्रम । ध्यान और मन द्वारा । स्वीकृत । और निषिद्ध । नियमों को देखकर । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 5
कर्मानुष्ठानमज्ञानाद यथैवोपरमस्तथा । बुध्वा सम्यगिदं तत्त्वं एवमेवाहमास्थितः । 12-6
कर्मों के । अनुष्ठान रूपी । अज्ञान से । निवृत्त होकर । और तत्त्व को । सम्यक रूप से जानकर । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 6
अचिंत्यं चिंत्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ । त्यक्त्वा तदभावनं तस्माद् एवमेवाहमास्थितः । 12-7
अचिन्त्य के । सम्बन्ध में । विचार करते हुए भी । विचार पर ही । चिंतन । किया जाता है । अतः । उस विचार का भी । परित्याग करके । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 7
एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ । एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ । 12-8
जो । इस प्रकार से । आचरण करता है । वह कृतार्थ ( मुक्त ) हो जाता है । जिसका । इस प्रकार का । स्वभाव है । वह कृतार्थ ( मुक्त ) हो जाता है । 8
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अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 14


अष्टावक्र उवाच - भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी  । निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति । 11-1
अष्टावक्र बोले - भाव ( सृष्टि । स्थिति ) और अभाव ( प्रलय । मृत्यु ) रूपी विकार । स्वाभाविक हैं । ऐसा निश्चित रूप से । जानने वाला । विकार रहित । दुख रहित होकर । सुख पूर्वक । शांति को । प्राप्त हो जाता है । 1
ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी । अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते । 11-2
ईश्वर । सबका । सृष्टा है । कोई अन्य नहीं । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाले की । सभी । आन्तरिक इच्छाओं का । नाश हो जाता है । वह शांत पुरुष । सर्वत्र । आसक्ति रहित । हो जाता है । 2
आपदः संपदः काले दैवादेवेति निश्चयी । तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति । 11-3
संपत्ति ( सुख ) और विपत्ति ( दुःख ) का समय । प्रारब्धवश ( पूर्वकृत कर्मों के अनुसार ) है । ऐसा । निश्चित रूप से जानने वाला । संतोष । और निरंतर । संयमित इन्द्रियों से । युक्त हो जाता है । वह न । इच्छा करता है । और न शोक । 3
सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी । साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते । 11-4
सुख दुःख । और । जन्म मृत्यु । प्रारब्धवश ( पूर्वकृत कर्मों के अनुसार ) हैं । ऐसा । निश्चित रूप से जानने वाला । फल की इच्छा । न रखने वाला । सरलता से । कर्म करते हुए भी । उनसे लिप्त नहीं होता है । 4
चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी । तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः । 11-5
चिंता से ही । दुःख । उत्पन्न होते हैं । किसी । अन्य कारण से नहीं । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाला । चिंता से रहित होकर । सुखी । शांत । और सभी इच्छाओं से । मुक्त हो जाता है । 5
नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी । कैवल्यं इव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम । 11-6
न मैं । यह शरीर हूँ । और न यह । शरीर मेरा है । मैं ज्ञानस्वरुप हूँ । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाला । जीवन मुक्ति को । प्राप्त करता है । वह किये हुए ( भूतकाल ) और न किये हुए ( भविष्य के ) कर्मों का । स्मरण नहीं करता है । 6
आबृह्मस्तंबपर्यन्तं अहमेवेति निश्चयी । निर्विकल्पः शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः । 11-7
तृण से लेकर । बृह्मा तक । सब कुछ । मैं ही हूँ । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाला । विकल्प ( कामना ) रहित । पवित्र । शांत । और प्राप्त अप्राप्त से । आसक्ति रहित । हो जाता है । 7
नाश्चर्यमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चयी । निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किंचिदिव शाम्यति । 11-8
अनेक । आश्चर्यों से युक्त । यह विश्व । अस्तित्वहीन है । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाला । इच्छा रहित । और शुद्ध अस्तित्व । हो जाता है । वह । अपार शांति को । प्राप्त करता है ।
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अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 13


अष्टावक्र उवाच - विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसंकुलम । धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रादरं कुरु । 10-1
अष्टावक्र बोले - कामना । और अनर्थों के समूह । धन रूपी । शत्रुओं को त्याग दो । इन दोनों के । त्याग रूपी धर्म से । युक्त होकर । सर्वत्र विरक्त ( उदासीन ) हो जाओ । 1
स्वप्नेन्द्रजालवत पश्य दिनानि त्रीणि पंच वा । मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसंपदः । 10-2
मित्र । जमीन । कोषागार । पत्नी । और अन्य संपत्तियों को । स्वपन की । माया के समान । तीन या पाँच दिनों में । नष्ट होने वाला देखो । 2
यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै । प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव । 10-3
जहाँ जहाँ । आसक्ति हो । उसको ही । संसार जानो । इस प्रकार । परिपक्व वैराग्य के । आश्रय में । तृष्णा रहित होकर । सुखी हो जाओ । 3
तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते । भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः । 10-4
तृष्णा ( कामना ) मात्र ही । स्वयं का । बंधन है । उसके नाश को ।  मोक्ष कहा जाता है । संसार में । अनासक्ति से ही । निरंतर । आनंद की प्राप्ति होती है । 4
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अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 12


तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते । भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः । 10-4
तृष्णा ( कामना ) मात्र ही । स्वयं का । बंधन है । उसके नाश को ।  मोक्ष कहा जाता है । संसार में । अनासक्ति से ही । निरंतर । आनंद की प्राप्ति होती है । 4
त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा । अविद्यापि न किंचित्सा का बुभुत्सा तथापि ते । 10-5
तुम एक ( अद्वितीय ) चेतन । और शुद्ध हो । तथा यह विश्व । अचेतन । और असत्य है । तुममें । अज्ञान का । लेश मात्र भी । नहीं है । और जानने की । इच्छा भी । नहीं है । 5
राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च । संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि । 10-6
पूर्व जन्मों में । बहुत बार । तुम्हारे । राज्य । पुत्र । स्त्री । शरीर । और सुखों का । तुम्हारी । आसक्ति होने पर भी । नाश हो चुका है । 6
अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा । एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून मनः । 10-7
पर्याप्त धन । इच्छाओं । और । शुभ कर्मों द्वारा भी । इस संसार रूपी माया से । मन को शांति नहीं मिली । 7
कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा । दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम । 10-8
कितने जन्मों में । शरीर । मन । और वाणी से । दुःख के कारण । कर्मों को । तुमने नहीं किया ? अब उनसे । उपरत ( विरक्त ) हो जाओ । 8 

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अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 11


अष्टावक्र उवाच - कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा । एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद भव त्यागपरोऽव्रती । 9-1
अष्टावक्र बोले - यह कार्य । करने योग्य है । अथवा । न करने योग्य । और ऐसे ही । अन्य द्वंद्व ( हाँ या न रूपी संशय ) कब । और किसके । शांत हुए हैं । ऐसा विचार करके । विरक्त ( उदासीन ) हो जाओ । त्यागवान बनो । ऐसे किसी नियम का । पालन न करने वाले बनो । 1
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात । जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमः गताः । 9-2
हे पुत्र ! इस संसार की ( व्यर्थ ) चेष्टा को । देखकर । किसी धन्य पुरुष की ही । जीने की इच्छा । भोगों के । उपभोग की इच्छा । और भोजन की इच्छा । शांत हो पाती है । 2
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रयदूषितम । असरं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति । 9-3
यह सब । अनित्य है । तीन प्रकार के कष्टों ( दैहिक । दैविक । और भौतिक ) से घिरा है । सारहीन है । निंदनीय है । त्याग करने योग्य है । ऐसा निश्चित करके ही । शांति प्राप्त होती है । 3
कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम । तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात । 9-4
ऐसा । कौन सा समय । अथवा उम्र है । जब मनुष्य के । संशय । नहीं रहे है । अतः । संशयों की । उपेक्षा करके । अनायास । सिद्धि को प्राप्त करो । 4
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अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 10


कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम । तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात । 9-4
ऐसा । कौन सा समय । अथवा उम्र है । जब मनुष्य के । संशय । नहीं रहे है । अतः । संशयों की । उपेक्षा करके । अनायास । सिद्धि को प्राप्त करो । 4
ना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा  दृष्टवा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः । 9-5
महर्षियों । साधुओं । और योगियों के । विभिन्न मतों को देखकर । कौन मनुष्य । वैराग्यवान होकर । शांत नहीं हो जायेगा । 5
कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः । निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः । 9-6
चैतन्य का । साक्षात ज्ञान प्राप्त करके । कौन वैराग्य । और समता से युक्त । कौन गुरु । जन्म और मृत्यु के । बंधन से । तार नहीं देगा । 6 
पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान यथार्थतः । तत्क्षणाद बन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि । 9-7
तत्त्वों के । विकार को । वास्तव में । उनकी मात्रा के । परिवर्तन के । रूप में देखो । ऐसा देखते ही । उसी क्षण । तुम । बंधन से मुक्त होकर । अपने स्वरुप में । स्थित हो जाओगे । 7 
वासना एव संसार इति सर्वा विमुंच ताः । तत्त्यागो वासनात्यागात्स्थितिरद्य यथा तथा । 9-8
इच्छा ही । संसार है । ऐसा जानकर । सबका । त्याग कर दो । उस त्याग से । इच्छाओं का । त्याग हो जायेगा । और तुम्हारी । यथारूप । अपने स्वरुप में । स्थिति हो जाएगी । 8
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अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 9


अष्टावक्र उवाच - तदा बन्धो यदा चित्तं किन्चिद वांछति शोचति । किंचिन मुंचति गृण्हाति किंचिद दृष्यति कुप्यति । 8-1
अष्टावक्र बोले - तब । बंधन है । जब । मन इच्छा करता है । शोक करता है । कुछ त्याग करता है । कुछ गुहण करता है । कभी प्रसन्न होता है । या कभी क्रोधित होता है । 1
तदा मुक्तिर्यदा चित्तं न वांछति न शोचति । न मुंचति न गृण्हाति न हृष्यति न कुप्यति । 8-2
तब । मुक्ति है । जब मन । इच्छा नहीं करता है । शोक नहीं करता है । त्याग नहीं करता है । ग्रहण नहीं करता है । प्रसन्न नहीं होता है । या क्रोधित नहीं होता है । 2
तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं काश्वपि दृष्टिषु । तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु । 8-3
तब बंधन है । जब मन किसी भी । दृश्यमान वस्तु में । आसक्त है । तब मुक्ति है । जब मन किसी भी । दृश्यमान वस्तु में । आसक्ति रहित है । 3
यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा । मत्वेति हेलया किंचिन्मा गृहाण विमुंच मा । 8-4
जब तक । मैं या मेरा । का भाव है । तब तक बंधन है । जब । मैं या मेरा । का भाव नहीं है । तब मुक्ति है । यह जानकर । न कुछ त्याग करो । और न कुछ गृहण ही करो । 4
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अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 8


जनक उवाच - मय्यनंतमहांभोधौ विश्वपोत इतस्ततः । भृमति स्वांतवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता । 7-1
जनक बोले - मुझ । अनंत महासागर में । विश्व रूपी जहाज । अपनी अन्तः वायु से । इधर उधर घूमता है । पर इससे । मुझमें । विक्षोभ नहीं होता है । 1
मय्यनंतमहांभोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः । 7-2
मुझ अनंत । महासागर में । विश्व रूपी लहरें । माया से । स्वयं ही । उदित और अस्त । होती रहती हैं । इससे मुझमें । वृद्धि या क्षति नहीं होती है । 2
मय्यनंतमहांभोधौ विश्वं नाम विकल्पना । अतिशांतो निराकार एतदेवाहमास्थितः । 7-3
मुझ अनंत महासागर में विश्व एक अवास्तविकता ( स्वपन ) है । मैं अति शांत और निराकार रूप से स्थित हूँ । 3
नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरंजने । इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्तितः । 7-4
उस अनंत । और निरंजन । अवस्था में । न मैं का भाव है । और न कोई । अन्य भाव ही । इस प्रकार असक्त । बिना किसी इच्छा के । और शांत रूप से । मैं स्थित हूँ । 4
अहो चिन्मात्रमेवाहं इन्द्रजालोपमं जगत । इति मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना । 7-5
आश्चर्य है । मैं शुद्ध चैतन्य हूँ । और यह जगत । असत्य जादू के समान है । इस प्रकार । मुझमें । कहाँ और कैसे । अच्छे (उपयोगी) और बुरे (अनुपयोगी) की । कल्पना आ जाती है । 5
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अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 7


अष्टावक्र उवाच - आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकशः । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद ऋते । 16-1
अष्टावक्र बोले - हे तात ! अनेक प्रकार से । अनेक शास्त्रों को । कह या सुन लेने से भी । बिना सबका विस्मरण किये । तुम्हें शांति नहीं मिलेगी । 1
भोगं कर्म समाधिं वा कुरु विज्ञ तथापि ते । चित्तं निरस्तसर्वाशमत्यर्थं रोचयिष्यति । 16-2  
हे विज्ञ ( पुत्र ) ! चाहे तुम । भोगों का भोग करो । कर्मों को करो । चाहे तुम । समाधि को लगाओ । परन्तु सब आशाओं से । रहित होने पर ही । तुम अत्यंत सुख को । प्राप्त कर सकोगे । 2
आयासात्सकलो दुःखी नैनं जानाति कश्चन । अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निर्वृतिम । 16-3
शरीर निर्वाहार्थ ) परिश्रम करने के कारण ही । सभी मनुष्य दुखी हैं । इसको कोई नहीं जानता है । सुकृती ( महा ) पुरुष इसी उपदेश से । परम सुख को प्राप्त होते हैं । 3
व्यापारे खिद्यते यस्तु निमेषोन्मेषयोरपि । तस्यालस्य धुरीणस्य सुखं नन्यस्य कस्यचित । 16-4
जो नेत्रों के ढकने । और खोलने के । व्यापार से । खेद को प्राप्त होता है । उस आलसी पुरुष को ही सुख है । दूसरे किसी को नहीं । 4
इदं कृतमिदं नेति द्वंद्वैर्मुक्तं यदा मनः । धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत । 16-5
यह किया गया है । यह नहीं किया गया है । मन जब । ऐसे द्वन्द से । मुक्त हो जाय । तब वह धर्म । अर्थ । काम । और मोक्ष आदि से । निरपेक्ष ( इच्छा रहित ) होता है । 5
विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः । ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान । 16-6
बिषय का द्वेषी । विरक्त है । बिषय का लोभी । रागी है । ग्रहण और त्याग से रहित पुरुष । न ही त्यागी है । और न ही राग वान है । 6
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