शुक्रवार, अप्रैल 30, 2010

पहला जनम भूत का पइहो

दिवाने मन भजन बिना दुख पैहो ॥ पहला जनम भूत का पइहो सात जनम पछतहयो ।कांटा पर का पानी पैहो प्यासन ही मर जैहो ॥दूजा जनम सुवा का पैहो बाग बसेरा लैहो ।टूटे पंख मंडराने अधफड प्रान गवैहो ॥बाजीगर के बानर होइ हो लकडिन नाच नचैहो ।ऊंच नीच से हाथ पसरि हो मांगे भीख न पैहो ॥तेली के घर बैला होइहो आंखन ढांप ढंपैहयो । कोस पचास घरे मा चलहो बाहर होन न पैहो ॥पंचवा जनम ऊंट का पैहो बिन तोलन बोझ लदैहो ।बैठे से तो उठन न पैहो खुरच खुरच मर जैहो ॥धोबी घर गदहा होइहो कटी घास नहिं पैहो ।लदी लाद आपु चढ बैठे ले घाटे पहुंचैहो ॥पंछिन मां तो कौवा होइहो करर करर गुहरैहो ।उडि के जाय बैठि मैले थल गहरे चोंच लगैहो ॥सत्तनाम की हेर न करिहो मन ही मन पछतहयो ।कहे कबीर सुनो भई साधो नरक नसेनी पैहो ॥

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