शुक्रवार, अप्रैल 30, 2010

पंडित होय सो लइ बिचारा


शब्द 51

बूझ बूझ पंडित मन चित लाय, कबहुँ भरल है कबहुँ सुषाय ।
षन ऊबै षन डूबै ऊन औ गाह, रतन न मिलै पावै नहिं थाह ।
नदिया नहीँ समद बहै नीर, मच्छ न मरे केवट रहे तीर ।
पोहकर नहिं बाँधल तहां घाट, पुरइन नहीं कमल महँ बाट ।
कहैं कबीर यह मन का धोष, बैठा रहै चलन यहै चोष ।

शब्द 52

बूझ लीजै ब्रह्म ग्यानी ।
घोरि घोरि बरषा बरसावै, परिया बूंद न पानी ।
चिंउटी के पग हस्ती बाँधे, छेरी बीगर षावै ।
उदधि मांह ते निकरी छांछरी, चौडे ग्राह करावै ।
मेंढुक सर्प रहत एक संगे, बिलइया स्वान बियाई ।
नित उठि सिंह सियार सो डरपे, अदभुत कथो न जाई ।
कौने संसय मृगा बन घेरे, पारथ बाना मेलै ।
उदधि भूप तें तरुवर डाहै, मच्छ अहेरा षेलै ।
कहैं कबीर यह अदभुत ग्याना, को यह ग्यानहि बूझै ।
बिन पंषै उडि जाइ अकासै, जीवहि मरन न सूझै ।

शब्द 53

वह बिरवा चीन्हे जो कोई, जरा मरन रहित तन होई ।
बिरवा एक सकल संसारा, पेड एक फूटल तिनि डारा ।
मध्य की डार चार फल लागा, साषा पत्र गिनै को वाका ।
बेलि एक त्रिभुवन लपटानी, बाँधे ते छूटहिं नहिं ग्यानी ।
कहैं कबीर हम डाति पुकारा, पंडित होय सो लइ बिचारा ।

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Agra, uttar pradesh, India
भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।