शनिवार, अप्रैल 17, 2010

तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय ।

ते दिन गये अकारथी, संगत भई न संत । प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत ॥ तीर तुपक से जो लड़े, सो तो शूर न होय । माया तजि भक्ति करे, सूर कहावे सोय ॥तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय । सहजे सब विधि पाइये, जो मन जोगी होय ॥ तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे न सूर । तब लग जीव जग कर्मवश, जब लग ज्ञान ना पूर ॥दुर्लभ मानुष जनम है, देह न बारम्बार । तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥ दस द्वारे का पींजरा, तामें पंछी मौन । रहे को अचरज भयो गये अचम्भा कौन ॥ धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय । माली सीचें सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥न्हाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाय । मीन सदा जल में रहे धोये बास न जाय ॥पांच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय । एक पहर भी नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥ पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय । ढ़ाई आखर प्रेम का पढे सो पंड़ित होय ॥ पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात । देखत ही छिप जाएगा, ज्यों सारा परभात ॥ पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजो पहार । याते ये चक्की भली, पीस खाय संसार ॥ पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय । अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय ॥प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बजाय । चाहे घर में बास कर, चाहे बन मे जाय ॥बन्धे को बंधा मिले, छूटे कौन उपाय । कर संगति निरबन्ध की, पल में लेय छुड़ाय ॥
बन्धे को बन्धा मिला , छूटे कौन उपाय . अन्धे को अन्धा मिला , मारग कौन बताय
बूंद पड़ी जो समुद्र में, ताहि जाने सब कोय । समुद्र समाना बूंद में, बूझे बिरला कोय ॥ बाहर क्या दिखराइये, अन्तर जपिए राम । कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम ॥बानी से पहचानिए, साम चोर की घात । अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह की बात ॥ बड़ा हुआ सो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर । पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ॥मूंड़ मुड़ाये हरि मिले सब कोई लेय मुड़ाय । बार बार के मुड़ते भेड़ न बैकुण्ठ जाय ॥माया तो ठगनी बनी, ठगत फिरे सब देश । जा ठग ने ठगनी ठगो, ता ठग को आदेश ॥ भज दीना कहूं और ही, तन साधुन के संग । कहे कबीर कारी गजी, कैसे लागे रंग ॥माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय । भागत के पीछे लगे, सन्मुख भागे सोय ॥ मथुरा भावे द्वारिका भावे जो जगन्नाथ । साधु संग हरि भजन बिनु कछु न आवे हाथ ॥माली आवत देख के, कलियन करी पुकार । फूल फूल चुन लिए, काल हमारी बार ॥मैं रोऊं सब जगत को, मोको रोय न कोय । मोको रोवे सोचना, जो शब्द बोय की होय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं । सीस उतारे भुई धरे, तब बैठें घर माहिं ॥ या दुनिया में आ कर, छाड़ि देय तू ऐंठ । लेना हो सो लेइले, उठी जात है पैंठ ॥राम नाम चीन्हा नहीं, कीना पिंजर बास । नैन न आवे नीदरो अलग न आवे भास ॥ रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय । हीरा जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥ राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय । जो सुख साधु सगं में, सो बेकुंठ न होय ॥संगति सों सुख ऊपजे, कुसंगति सो दुख होय । कह कबीर तहं जाइये, साधु संग जहं होय ॥ साहिब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय । ज्यों मेहदी के पात में, लाली रखी न जाय ॥ सांझ पड़े दिन बीतबे चकवी दीन्ही रोय । चल चकवा वा देश को, जहां रैन नहिं होय ॥सत ही मे सत बांटे, रोटी में ते टूक । कहे कबीर ता दास को, कबहु न आवे चूक ॥ साई आगे सांच है, साई सांच सुहाय । चाहे बोले केस रख, चाहे घोंट मुण्डाय ॥लकड़ी कहे लुहार की, तू मत जारे मोहिं । एक दिन ऐसा होयगा, मैं जारूंगी तोहि ॥ हरिया जाने रुखड़ा, जो पानी का गेह । सूखा काठ न जान ही, केतुउ बूड़ा मेह ॥ज्ञान रतन का जतनकर माटी का संसार । आय कबीर फिर गया, फीका है संसार ॥ॠद्धि सिद्धि मांगो नहीं, मांगो तुम पे येह । निसि दिन दरशन साधु को, प्रभु कबीर को देहु ॥ क्षमा बड़ेन को उचित है, छोटे को उत्पात । कहा विष्णु का घटि गया, जो भुगु मारीलात ॥ राम नाम के पटतरे, देबे को कुछ नाहिं । क्या ले गुर संतोषिए, होंस रही मन माहिं ॥बलिहारी गुर आपणो घोहाड़ी के बार । जिनि मानष ते देवता करत न लागी बार ॥ ना गुरु मिल्या न सिष भया लालच खेल्या डाव । दुन्यू बूड़े धार में चढ़ि पाथर की नाव ॥ सतगुर हम सू रीझ कर एक कह्मा प्रसंग । बरस्या बादल प्रेम का भीजि गया अब अंग ॥ कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीख । स्वांग जती का पहरि करि, घर घर मांगे भीख ॥ यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान । सीस दिये जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान तू तू करता तू भया, मुझ में रही न हूं । वारी फेरी बलि गई, जित देखों तित तू

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...