शुक्रवार, अप्रैल 30, 2010

जो जो गए बहुर नहि आए

बहुरि नहिं आवना या देस जो जो गए बहुर नहि आए पठवत नाहिं संदेस ॥ सुर नर मुनि अरु पीर औलिया देवी देव गनेस ॥ धर धर जनम सबे भरमे हैं ब्रह्मा विष्णु महेस ॥ जोगी जंगम ओ संन्यासी दीगंबर दरवेस ॥ चुंडित मुंडित पंडित लोई सरग रसातल सेस ॥ ज्ञानी गुनी चतुर अरु कविता राजा रंक नरेस ॥ कोइ राम कोइ रहिम बखाने कोइ कहे आदेस ॥ नाना भेष बनाय सबे मिल ढूंढ फिरें चहु देस ॥ कहे कबीर अंत ना पैहो बिन सतगुरु उपदेश ॥

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