शनिवार, अप्रैल 17, 2010

बेस्या केरा पूत ज्यूं, कहे कौन सू बाप ??

राम पियारा छाड़ि करि, करे आन का जाप । बेस्या केरा पूत ज्यूं, कहे कौन सू बाप कबीरा प्रेम न चषिया चषि न लिया साव । सूने घर का पांहुणा ज्यूं आया त्यूं जाव ॥ कबीरा राम रिझाइ ले मुख अमृत गुण गाइ । फूटा नग ज्यूं जोड़ि मन संधे संधि मिलाइ ॥लंबा मारग, दूर घर विकट पंथ बहुमार । कहो संतो क्यूं पाइये दुर्लभ हरि दीदार ॥बिरह भुवगम तन बसे मंत्र न लागे कोइ । राम बियोगी ना जिवे जिवे तो बौरा होइ ॥ यह तन जालो मसि करों लिखों राम का नाउं । लेखणि करूं करंक की लिख लिख राम पठाउं ॥ अंदेसड़ा न भाजिसी, सदेसो कहिया । के हरि आया भाजिसी, के हरि ही पास गया ॥इस तन का दीवा करो बाती मेल्यूं जीवउं । लोही सींचो तेल ज्यूं कब मुख देख पठिउं ॥ अंषड़ियां झाईं पड़ी, पंथ निहार निहार । जीभड़ियां छाला पड़या राम पुकार पुकार ॥ सब रग तंत रबाब तन बिरह बजावे नित्त । और न कोई सुणि सके के साईं के चित्त ॥जो रोऊ तो बल घटे हंसो तो राम रिसाइ । मन ही माहिं बिसूरणा ज्यूं घुण काठहिं खाइ ॥कबीर हसणा दूरि करि करि रोवण सो चित्त । बिन रोया क्यूं पाइये प्रेम पियारा मित्व ॥ सुखिया सब संसार है खावे और सोवे । दुखिया दास कबीर है जागे अरु रोवे ॥परबत परबत मैं फिरया नैन गंवाए रोइ । सो बूटी पाऊं नहीं जाते जीवन होइ ॥ पूत पियारो पिता को गौहनि लागो धाइ । लोभ मिठाई हाथ दे आपण गयो भुलाइ हासी खेलो हरि मिले कोण सहे षरसान । काम क्रोध त्रिषना तजे तोहि मिले भगवान जा कारण में ढ़ूंढ़ती सनमुख मिलिया आइ । धन मैली पिव ऊजला लागि न सकों पाइ पहुंचेंगे तब कहेंगे उमङेंगे उस ठाई । अजहू बेरा समंद में बोलि बिगू पे काई दीठा है तो कस कहू कह्मा न को पतियाइ । हरि जैसा है तैसा रहो तू हरष हरष गुण गाइ
भारी कहों तो बहु डरों, हलका कहूं तो झूठ । मैं का जाणी राम कू नैन कबहू न दीठ
कबीर एक न जाण्या तो बहु जाण्या क्या होइ । एक ते सब होत है सब ते एक न होइ
कबीर रेख स्यंदूर की काजल दिया न जाइ । नैन रमैया रमि रहा दूजा कहाँ समाइकबीर कूता राम का मुतिया मेरा नाउं । गले राम की जेवड़ी जित खेंचे तित जाउं
कबीर कलिजुग आइ कर कीये बहुत जो मीत । जिन दिल बांध्या एक सूं ते सुख सोवे निचींत जब लग भगत सकामता, तब लग निष्फ़ल सेव । कह कबीर वे क्यूं मिले निह्कामी निज देव पतिबरता मैली भली गले कांच को पोत । सब सखियन में यों दिपे ज्यों रवि ससि को जोतकामी अमी न भावई विष ही को ले सोध । कुबुद्धि न जीव की भावे स्यंभ रहो प्रमोध भगति बिगाड़ी कामिया इन्द्री केरे स्वादि । हीरा खोया हाथ ते जनम गंवाया बाद परनारी का राचणो ज्यूं लहसण की खान । खूणें बेसिर खाइय परगट होइ दिवान परनारी राता फिरे चोरी बिढ़ ता खाहिं । दिवस चारि सरसा रहे अंत समूला जाहिं ग्यानी मूल गंवाइया आपण भये करना । ताते संसारी भला मन मैं रहे डरना कामी लज्जा ना करे मन माहें अहिलाद । नींद न मांगे सांथरा भूख न मांगे स्वाद कलि का स्वामी लोभिया पीतल धरी खटाइ । राज दुबारा यों फिरे ज्यूं हरयाई गाइस्वामी हूवा सीतका पैलाकार पचास । राम नाम काठें रह्मा करे सिषा की आस ॥इहि उदर के कारणे जग पाच्यो निस जाम । स्वामी पणो जो सिर चढ़यो सरे न एको काम ॥ ब्राह्मण गुरु जगत का साधू का गुरु नाहिं । उरझ पुरझ कर मर रहा चारउ बेदा मांहि ॥ कबीर कलि खोटी भई मुनियर मिले न कोइ । लालच लोभी मसकरा तिनकू आदर होइ ॥ कलि का स्वमी लोभिया मनसा घरी बधाई । देहि पईसा ब्याज़ को लेखा करता जाई ॥कबीर इस संसार को, समझाऊं के बार । पूंछ जो पकङे भेड़ की उतरया चाहे पार ॥तीरथ कर कर जग मुवा डूंधे पाणी न्हाइ । रामहि राम जपतंडा काल घसीटया जाइ ॥चतुराई सूवे पढ़ी सोइ पंजर मांहि । फिरि प्रमोधे आन को आपण समझे नाहिं ॥ कबीर मन फूल्या फिरे करता हूं मैं धरम । कोटि क्रम सिर ले चल्या, चेत न देखे भरम ॥

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