शनिवार, अप्रैल 17, 2010

मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥

दुख में सुमरन सब करें सुख में करे न कोय । जो सुख में सुमरिन करें दुख काहे को होय ॥ तिनका कबहु ना निंदिये जो पांव तले होय । कबहु उड़ आंखो पड़े पीर घनेरी होय ॥माला फेरत जुग भया फिरा न मन का फेर । कर का मन का डार दे मन का मनका फेर ॥गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागूं पांय । बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय ॥बलिहारी गुरु आपने घड़ी घड़ी सौ सौ बार । मानुष से देवत किया करत न लागी बार ॥ कबीरा माला मनहि की और संसारी भीख । माला फेरे हरि मिले गले रहट के देख ॥सुख में सुमिरन ना किया दुख में किया याद । कह कबीर ता दास की कौन सुने फरियाद ॥ सांई इतना दीजिये जा में कुटुम समाय । मैं भी भूखा न रहूं साधु ना भूखा जाय ॥ लूट सके तो लूट ले राम नाम की लूट । पाछे फिर पछताओगे प्राण जाहिं जब छूट ॥ जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान । मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान ॥ जहाँ दया तहाँ धर्म है जहाँ लोभ तहाँ पाप । जहाँ क्रोध तहाँ काल है जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥ धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय । माली सींचे सौ घड़ा ॠतु आए फल होय ॥कबिरा ते नर अन्ध हैं गुरु को कहते और । हरि रूठे गुरु ठौर है गुरु रुठे नहीं ठौर ॥ पांच पहर धन्धे गया तीन पहर गया सोय । एक पहर हरि नाम बिन मुक्ति कैसे होय ॥ कबीरा सोया क्या करे उठि न भजे भगवान । जम जब घर ले जायेंगे पड़ी रहेगी म्यान ॥ शीलवन्त सबसे बड़ा सब रतनन की खान । तीन लोक की सम्पदा रही शील में आन ॥ माया मरी न मन मरा मर मर गए शरीर । आशा तृष्णा न मरी कह गए दास कबीर ॥ माटी कहे कुम्हार से तु क्या रोंदे मोय । एक दिन ऐसा आएगा मैं रौदूंगी तोय ॥ रात गंवाई सोय के दिवस गंवाया खाय । हीरा जन्म अमोल था कोड़ी बदले जाय ॥ नींद निशानी मौत की उठ कबीरा जाग । और रसायन छांड़ि के नाम रसायन लाग ॥ जो तोकू कांटा बुवे ताहि बोय तू फूल । तोकू फूल के फूल है वाकू है त्रिशूल ॥ दुर्लभ मानुष जन्म है देह न बारम्बार । तरुवर ज्यों पत्ती झड़े बहुरि न लागे डार ॥ आये हें सो जांएगे राजा रंक फकीर । एक सिंहासन चढ़ चले एक बंधे जंजीर ॥ काल करे सो आज कर आज करे सो अब । पल में प्रलय होएगी बहुरि करेगा कब ॥ मांगन मरण समान है मति मांगो कोई भीख । मांगन से मरना भला यह सतगुरु की सीख ॥
जहाँ आपा तहाँ आपदा जहाँ संशय तहाँ रोग । कह कबीर यह क्यों मिटे चारों धीरज रोग ॥ माया छाया एक सी बिरला जाने कोय । भगता के पीछे लगे सम्मुख भागे सोय ॥ आया था किस काम को तु सोया चादर तान । सुरत सम्भाल ए गाफिल अपना आप पहचान ॥ क्या भरोसा देह का बिनस जात छिन मांह । सांस सांस सुमिरन करो और जतन कुछ नांह ॥ गारी ही सों ऊपजे कलह कष्ट और मींच । हारि चले सो साधु है लागि चले सो नींच ॥ दुर्बल को न सताइए जाकि मोटी हाय । बिना जीव की हाय से लोहा भस्म हो जाय ॥ दान दिए धन ना घटे नदी घटे न नीर । अपनी आँखों देख लो यों क्या कहे कबीर ॥ दस द्वारे का पिंजरा तामे पंछी का कौन । रहे को अचरज है गए अचम्भा कौन ॥ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय । औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय ॥ हीरा वहाँ न खोलिये जहाँ कुंजड़ों की हाट । बांधो चुप की पोटरी लागहु अपनी बाट ॥कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार । साधु वचन जल रूप, बरसे अमृत धार ॥जग में बैरी कोई नहीं जो मन शीतल होय । यह आपा तो ड़ाल दे दया करे सब कोय ॥ मैं रोऊं सब जगत को मोको रोवे न होय । मोको रोबे सोचना जो शब्द बोय की होय ॥ सोवा साधु जगाइए करे नाम का जाप । यह तीनों सोते भले साकत सिंह और सांप ॥ अवगुन कहूं शराब का आपा अहमक साथ । मानुष से पशुआ करे दाय गांठ से खात ॥बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ । नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥अटकी भाल शरीर में तीर रहा है टूट । चुम्बक बिना निकले नहीं कोटि पटन को फ़ूट ॥कबीरा जपना काठ की, क्या दिखलावे मोय । ह्रदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय ॥पतिवृता मैली भली, काली कुचल कुरूप । पतिवृता के रूप पर, वारो कोटि सरूप ॥ बैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार । एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार हद चाले तो मानवा, बेहद चले सो साध । हद बेहद दोनों तजे, ताको मता अगाध ॥ राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस । रहे कबीर पाखण्ड सब, झूठे सदा निराश ॥जाके जिभ्या बन्धन नहीं, ह्रदय में नहीं सांच । वाके संग न लागिये, खाले वटिया कांच ॥ तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार । सतगुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार ॥सुमरण से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन । प्राण तजे बिन बिछड़े, सन्त कबीर कह दीन ॥ समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय । मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥
हंसा मोती बीनिया, कंचन थार भराय । जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय ॥ कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय । एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय ॥

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