शुक्रवार, अप्रैल 30, 2010

मैं कहता तू जागत रहियो तू जाता है सोई रे

तेरा मेरा मनवा कैसे एक होइ रे ।
मैं कहता हों आंखन देखी तू कहता कागद की लेखी ।
मैं कहता सुरझावन हारी तू राखयो अरुझाई रे ॥
मैं कहता तू जागत रहियो तू जाता है सोई रे ।
मैं कहता निरमोही रहियो तू जाता है मोहि रे ॥
जुगन जुगन समझावत हारा कहा न मानत कोई रे ।
तू तो रंगी फिरे बिहंगी सब धन डारा खोई रे ॥
सतगुरू धारा निर्मल बाहे बामे काया धोई रे ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो तब ही वैसा होई रे ॥

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

प्रिय राजीव जी , मै अपने इसी जीवन में मुक्त होने की इस्छा रखता हु कृपया मेरा मार्गदर्शन करे में ४-५ बार अलग अलग गुरुओ से दीक्षा ले चिका हु परन्तु उचित मार्गदर्शन न होने से भटकाव बहोत अधिक हो गया है दूसरा कबीर साहेब की पुस्तक पढ़ कर मालूम हुआ की काल भी साथ साथ कम कर रहा है तो कैसे एक रंगरूट भेद कर पायेगा सही और गलत ज्ञान में ; आपके उत्तर का बहोत शीघ्र अभिलाषी हु क्युकी कब ये साँस रुक जाय और फिर में काल ग्रास बन जाऊ कृपया सहायता करे: अशोक कुमार : ०९६५४९६५४७७ दिल्ली से

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