मंगलवार, मई 11, 2010

वैश्या मधुमती का योगदान..दशरथ के पुत्रेष्टि यग्य में ??

राजा दशरथ के चारों पुत्र पुत्रेष्टि यग्य द्वारा प्राप्त फ़ल या खीर द्वारा हुये प्रायः यह वाकया सभी जानते हैं पर इस यग्य को सम्पन्न करवाने में एक वैश्या ने अपना जीवन दाव पर लगा दिया था और एक द्रष्टिकोण से यह वैश्या राम आदि भाईओं की बूआ बन गयी इस बात को शायद बहुत कम ही लोग जानते होंगे .
दरअसल इस सृष्टि का निर्माण क्योंकि माया के परदे पर है इसलिये सत्य देख पाना बेहद कठिन होता है.
ब्रह्माण्ड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति वेद कहे .
सुन रावन ब्रह्माण्ड निकाया पाय जासु बल विचरित माया .
जैसे कभी हम सिनेमा देख रहे होते हैं और हमें बखूबी मालूम होता है कि ये कल्पित है फ़िर भी हम कथावस्तु के अनुसार भावों में खो जाते हैं और कुछ देर को उसी कहानी को सत्य की तरह जीने लगते हैं .
इस संदर्भ में मुझे दो विस्मयकारी ( होनी चाहिये ) बातें याद आती हैं . सिकन्दर महान और बादशाह अकबर . इनके दो अदभुत (मेरे ख्याल में) उदाहरण ही महान सत्य को उदघाटित करने हेतु काफ़ी हैं . सिकन्दर जब विश्वविजय यात्रा पर था कबीर ने उसे भिखारी कहा और फ़िर कई घटनाक्रमों के बाद वह कबीर का शिष्य बना न सिर्फ़ शिष्य बना उसने सुरति शब्द साधना का परम उपदेश भी लिया .दूसरा उदाहरण अकबर का लें एक बार अकबर तानसेन की बङे दिल से तारीफ़ कर रहा था तब तानसेन ने सकुचाते हुये कहा कि सम्राट मैं अपने गुरु हरिदास जी के पैरों की धूल भी नहीं हूँ . अकबर यह सुनकर भोंचक्का रह गया आनन फ़ानन वह हरिदास जी के पास पहुँचा तब उसे बोध हुआ कि तानसेन सही कह रहा है उसने उस अलौकिक ग्यान की अनुभूति की और हरिदास जी से उपदेश भी लिया .वह इस ग्यान से इतना प्रभावित हुआ कि उसने मथुरा वृन्दावन जो उस समय मात्र जंगल थे पर सुन्दर मन्दिर जनमभूमि आदि का पहली बार निर्माण कराया .बाद में राजपूत आदि अन्य कई राजाओं द्वारा उस निर्माण को आगे बङाया गया लेकिन उस की शुरुआत करने वाला अकबर ही था .
सतसंग सभा में जब कोई बात बहस का रूप ले लेती है मैं हमेशा एक ही बात अधिक कहता हूँ आप अपने समग्र अध्ययन का स्वतः मूल्यांकन करे फ़िर किसी बङी हस्ती जिसमें विलक्षण बदलाव हुआ हो उसको बारीकी से देखे फ़िर अपने स्तर से उसकी तुलना करे सच्चाई एकदम सामने होगी .
उदाहरण सिकन्दर और अकबर की तुलना में ये तर्क (प्राय कुतर्क) देने वाले कहाँ ठहरते है . इसी तरह हिंसा के पक्षधरों से में कहता हूँ कि आप सम्राट अशोक या अन्गुलिमाल जैसे हिंसक हो सकते हैं ...नहीं..तो जब उन जैसे बदल गये तो फ़िर आप देखें कि आप की स्थिति क्या है..यही सत्य की खोज है .
एक्चुअली सच्चाई को दबा देने से भ्रान्ति पैदा होती है जो हम ग्यानी लोग अपने अहम की तुष्टि और निज निहित स्वार्थ हेतु करते हैं..आप ईसामसीह को लें यदि ईसा के जीवन वृत का ईमानदारी से अवलोकन करें तो ईसा कई बार भारत आकर लम्बे समय तक रहे यहाँ किसी संत से ग्यान लिया...क्रूस से उतारे जाने के बाद भारत आये.. रहे .. जख्मों का इलाज कराया..अगर ये सभी इतिहास उसी तरह मनुष्य के सामने होता जैसा घटित हुआ था तो बहुत सी असाध्य बीमारियों से हम मुक्त होते जो फ़ालतू की हैं .
जब दशरथ जी को किसी प्रकार संतान प्राप्ति की आशा न रही तो उन्होने इस सम्बन्ध में अलौकिक ग्यान के दिग्गजों की एक मीटिंग बुलायी..और इस हेतु हर संभव उपाय बताने का निवेदन किया . तब उस मीटिंग में विद्वानों ने एकमात्र उपाय बताया जो बहुत ही दुष्कर था .वह उपाय ये था कि कोई ब्रह्मचर्य युक्त तपस्वी जिसकी तपस्या को बारह बरस पूरे हो चुके हों. दशरथ के पुत्रेष्टि यग्य में आहुति दे तो जो यग्यफ़ल प्राप्त होगा उससे संतान हो सकती है लेकिन तपस्वी द्वारा आहुति देने पर बारह बरस का अर्जित तप समाप्त (खर्च) हो जायेगा.अब ऐसा
कोई क्यों करेगा...जो अपना तप स्वयं नष्ट कर दे ? फ़िर भी राजा ने खोया ऊँट घङे में तलाशने जैसा काम किया . दशरथ ने ग्यानियों से आग्रह किया कि वे दिव्य द्रष्टि से देखे कि ऐसा तपस्वी इस समय कौन है तथा किस स्थान पर है .रिषियों ने देखा और मुस्कराकर कहा कि राजन वो आपके घर का ही है पर उसको राजी करना लगभग असंभव जैसा ही है . दशरथ ने निज स्वार्थवश वशीभूत होकर पूछा वह कौन है ?
श्रंगी रिषी . रिषियों ने जबाब दिया .
श्रंगी रिषी ये दो शब्द शक्तिशाली बम की तरह फ़टे क्योंकि श्रंगी को उनकी गुफ़ा से बाहर निकालना इतना कठिन था कि आसमान से तारे तोङना उसकी तुलना में बेहद सरल था श्रंगी एक रिस्ते से दशरथ के बहनोई लगते थे यधपि वे पूर्ण ब्रह्मचारी थे और उस समय तक काम और कामिनी से एकदम दूर थे . विवाह करने का तो कोई प्रश्न ही नही था. वहाँ से काफ़ी दूर बनप्रांत की एक गुफ़ा में तपस्या में लीन थे और कभी किसी से मिलते नहीं थे यहाँ तक कि लोगों ने उन्हें कभी देखा (तप के समय से ) भी नहीं था . दशरथ निराश हो गये लेकिन उम्मीद के तौर पर उन्होनें शहर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो कोई श्रंगी को उनकी गुफ़ा से निकालकर दशरथ के महल तक लायेगा उसे इनाम से मालामाल कर दिया जायेगा . इस मुनादी पर लोग हँसे और कहा कि दशरथ बुढापे में सठिया गये हैं..श्रंगी जैसे तपस्वी को तप में छेङना यानी उनके शाप को न्योता देना है जो किसी को भी समूल तबाह कर सकता है फ़िर वह इनाम किसके लिये होगा ? आखिर ये चैलेंज एक वैश्या ने कबूल किया .
(थोङा विषयान्तर करते हुये मैं एक बात पर ध्यान दिलाना चाहूँगा कि आप देखे वैश्या त्रेता युग में भी थी .आखिर इस वैश्या का उपभोग कौन क्यों और क्या करता होगा ? क्या कुछ लोग उस समय भी रडुये थे ? या पत्नी वाले भी इस तरह के शौक रखते थे ? सबसे महत्वपूर्ण ये कि ये वैश्या दशरथ के राज्य में थी .ये बात खास उन लोगों के लिये है जो आज के समय को नैतिकता मूल्यों में गिरा मानते हैं और कहते हैं कि पहले का जमाना ऐसा नहीं था ? आप को उस धोवी का किस्सा भी याद होगा जिसके कारण सीता को पुनः वनवास हुआ .ये किस्सा इस बात की पुष्टि करता है कि आदमी को उस समय भी शक था कि उसकी औरत मौका मिलते ही पर पुरुष के साथ सहवास कर सकती है . जाहिर है ऐसी घटनायें होती होगी अन्यथा अकारण ही किसी बात का जन्म नहीं होता.)
वैश्या ने राजा से पाँच साल का समय और उस अवधि का पूर्ण खर्चा एडवांस मांगा जिसे राजा ने सहर्ष दिया . तब ये चतुर वैश्या उस स्थान पर गयी जहाँ तपस्वी श्रंगी तप में लीन थे .लगभग दस दिन उस गुफ़ा से बाहर एकान्त में छिपकर उस वैश्या ने यही पता लगाया कि श्रंगी चौबीस घन्टे में सिर्फ़ एक बार रात के बारह बजे गुफ़ा के द्वार पर लगा पत्थर थोङा खिसकाकर निकलते हैं और गुफ़ा के निकट खङे एक पेढ की छाल को (जिसे उन्होने चीर कर खुरच दिया था जिससे पेढ का रस निकलकर जमा हो जाता था ) जीभ से चाटते थे . बस यही उनका आहार था और यही उनकी सम्पूर्ण दिनचर्या भी थी .
हाय राम इसको पटाना तो बहुत मुश्किल है . लगता है बात बनेगी नहीं वैश्या ने सोचा . पर वैश्या भी अपने हुनर में बेहद कुशल थी उसने एक उपाय आजमाया और गुङ की चाशनी बनाकर उस स्थान पर लगा आयी जिसको श्रंगी चाटते थे . उस रात जब श्रंगी ने आहार लिया तो छाल मीठी मीठी लगी..वे चौंक कर चारो तरफ़ देखने लगे और
उनके मुँह से निकला अरे यह क्या..ये क्या..पर उत्तर कौन देता..कहीं कोई नहीं था वैश्या छुपकर ये नजारा देख रही थी कि देखें क्या प्रतिक्रिया होती है..श्रंगी थोङा देर इधर उधर देखते रहे और फ़िर गुफ़ा में चले गये ..वैश्या मुस्करायी . उपाय काम कर गया .
यह क्रम बीस दिनों तक चला..श्रंगी को इसका रहस्य पता न चला अलवत्ता उन्होनें सोचा ये व्यवस्था प्रभु प्रदत्त है .उन्हें बिना किये कुछ अधिक और अच्छा आहार मिल रहा था . इक्कीसबें दिन वैश्या ने गुङ की चाशनी के स्थान पर रबङी का लेप कर दिया . श्रंगी फ़िर चौंके अरे ये क्या...ये क्या..फ़िर कोई उत्तर नहीं..श्रंगी फ़िर गुफ़ा में अन्दर
सोचा ..प्रभु की ही लीला है जो भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं .वरना इस बियावान में पेङ पर इस तरह के खाद्ध पदार्थ कहाँ से आ सकते हैं ?
अगले तीस दिन तक वैश्या रबङी की मात्रा बङाती गयी और रेसिपी के विभिन्न नुस्खों को आजमाती हुयी कभी रबङी में किशमिश कभी घिसा नारियल चूरा कभी चिरोंजी जैसे आयटम जोङती गयी..श्रंगी थोङी देर अचंभित होते फ़िर प्रभु की लीला मानकर खा लेते क्योंकि दूर दूर तक ऐसा करने वाला कोई नहीं था..? सार ये कि श्रंगी की भूख जाग्रत होने लगी जो कि योग से स्थिर हो गयी थी . इसके बाद वैश्या ने पेङ पर कुछ लेप करने के बजाय स्वादिष्ट मेवायुक्त खीर बनाकर विधिवत तरीके से ढककर पेङ के नीचे रख दी..श्रंगी ने नियत समय पर आकर पेङ चाटा तो वहाँ कुछ नहीं था वे बहुत परेशान हुये..आहार लेने से भूख सता रही थी...तभी उनकी द्रष्टि पेङ के नीचे रखी कटोरी पर गयी..चौंककर कुछ सकुचाते हुये उन्होनें खीर उठा ली और पात्र हाथ में लेकर शंकित द्रष्टि से इधर उधर देखा और ऊँची आवाज में कहा..अरे कोई यहाँ है क्या..कोई उत्तर नहीं ...कुछ देर के चिंतन के बाद प्रभु चमत्कार मानकर
उन्होनें खीर खा ली..वैश्या रहस्यमय ढंग से मुस्करायी . यह क्रम भी एक महीने चला फ़िर उसने खीर के स्थान पर सम्पूर्ण भोजन की सुन्दर थाली रखी फ़िर वही...अगले दो महीने तक श्रंगी ने आम इंसान की तरह दाल सब्जी
पूङी परांठे खीर पापङ सलाद अचार सब खाया और उस अद्रश्य और चमत्कारिक खाने के आदी हो गये..बल्कि साधना में भी उन्हें ये चिंतन हो आता कि देखें आज भोजन में क्या मिले ?
इस स्थित में दस माह गुजर गये तब एक दिन खाने की वह स्वादिष्ट थाली गायब हो गयी..श्रंगी बहुत परेशान..भूख प्रबल हो रही थी...चारों तरफ़ व्याकुल होकर देखते कहीं कोई नहीं..उन्होनें ऊँची आवाज में कहा कि मुझे रोज भोजन देने वाला आज कहाँ है सामने आये..मैं भूख से व्याकुल हो रहा हूँ ..
प्रत्युत्तर में एक नारी आवाज आयी कि पहले आप वचन दें कि मेरी गलतियों को क्षमा करेंगे..और मेरी सेवा का अनुचित विचार से सम्बन्ध न जोङेंगे . हैरान श्रंगी ने जल्दी में वचन दे दिया . तुरन्त एक अप्रतिम सोन्दर्य की मालकिन यौवन के भार से लदी हुयी.पर दिखने में एकदम शालीन..युवती अन्धेरे से निकलकर बाहर आयी..उसने श्रंगी को करबद्ध प्रणाम किया और कहा कि प्रभो गत दस माह से आपकी सेवा करने वाली वो तुच्छ दासी में ही हूँ .
सेवा का प्रयोजन क्या है ?
कुछ नहीं सन्तों की सेवा में शान्ति और आनन्द तो है ही अक्षय फ़ल की प्राप्ति भी है . श्रंगी उसके भाव जानकर अत्यंत प्रसन्न हुये उन्होनें सोचा कि मेरा विचार कितना गलत था कि नारी महज वासना की पुतली है और पुरुषों के साधन मोक्षमार्ग में बहुत बङी बाधा है ...ओ हो.. मैं सोचता था ..नारी नारी..नहीं नरक का द्वार है.. ओ हो.. कितना गलत था मैं ..धन्य हो देवी तुम धन्य हो .
मेरा नाम मधुमती है प्रभो .
इस तरह कुछ समय तक मधुमती उसी समय उन्हें भोजन कराती..श्रंगी तुरंत गुफ़ा में जाने के स्थान पर कुछ देर तक उसके पास बैठकर उपदेश आदि करते..मधुमती का आंचल अक्सर उसके उन्नत उरोजों से उङ जाता..यौवनरस से लबालब भरे नारी स्तन के आकर्षण से श्रंगी बच न पाये..लेकिन दोनों ही इस बारे में अनभिग्य बने रहे..या जानबूझकर बहाना करते रहे ..धीरे धीरे मधुमती को गुफ़ा में प्रवेश की आग्या मिल गयी..और फ़िर वह कभी कभी..फ़िर अक्सर ही..फ़िर ज्यादातर ही गुफ़ा में आने जाने लगी..फ़िर साधिकार रहने लगी..उसका असली उद्देश्य श्रंगी द्वारा स्व योनि में शिश्न प्रहार का था..नारी की निरंतर निकटता से श्रंगी में कामरस उमङने लगा और वे काम के वशीभूत होकर..मधुमती से सम्भोग करने लगे . मधुमती काम को धर्मशास्त्र का अंग बताकर योनिच्छेद में लिंग प्रहार हेतु उकसाती श्रंगी को ये अनुचित इसलिये नहीं लगा क्योंकि उनकी साधना पूर्ववत चल रही थी..और मधुमती उनकी साधना तथा अन्य देखभाल पूरे मनोयोग से करती थी .
अगले चार सालों में मधुमती ने श्रंगी के चार पुत्रों को जन्म दिया . तब खर्चा आदि बढने की बात कहकर.. किसी माध्यम से धन की व्यवस्था हो ऐसा कहकर मधुमती ने उन्हें नगर जाने हेतु राजी कर लिया..क्योंकि अब उनके
बच्चे भी थे .श्रंगी परिस्थितियों के आगे विवश हो गये और इस तरह नियत समय में ही मधुमती उन्हें दशरथ के महल में लाने में कामयाब हो गयी..अब रास्ता आसान था..सब लोगों ने उन्हें समझाया कि वे दसरथ के पुत्रेष्टि यग्य में आहुति डाले..
श्रंगी भली भांति जानते कि उनका तप नष्ट हो जायेगा..लेकिन ऐसा करने पर राजा उन्हें भारी धन देते जिसको लेकर मधुमती अपने बच्चों को स्वयं पालने पर तैयार थी और वे फ़िर नये सिरे से निर्विघ्न साधना कर सकते थे..और मधुमती से कामवासना का लगाव भी अब नही रहा था..इस तरह परिस्थितियों से मजबूर श्रंगी ने आहुति
दी .यग्य फ़ल प्रकट हुआ जिसको खाकर दशरथ की रानियां गर्भवती हुयीं..श्रंगी के आगे सब भेद खुल गया पर इसको ईश्वर की इच्छा मानकर वे पुनः साधना के लिये चले गये..क्योंकि तिनका तिनका करके वे स्वयं कामवासना से मोहित हुये थे.

4 टिप्‍पणियां:

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ने कहा…

मेरा ब्लागिंग उद्देश्य गूढ रहस्यों को
आपस में बांटना और ग्यानीजनों से
प्राप्त करना भी है..इसलिये ये आवश्यक नहीं
कि आप पोस्ट के बारे में ही कमेंट करे कोई
दुर्लभ ग्यान या रोचक जानकारी आप सहर्ष
टिप्पणी रूप में पोस्ट कर सकते हैं ..आप सब का हार्दिक
धन्यवाद
satguru-satykikhoj.blogspot.com

singhsdm ने कहा…

आपकी पोस्ट पढ़ कर एक दम ऐसे संसार में हम चले गए जो सनातन संस्कृति का उदघोष करता है......बहुत पवित्र प्रस्तुति...नमन !

कविता रावत ने कहा…

Aapka pryas saraniya hai...Aaj bhi puratan sahitya ki prashangikta kayam hai..... Yadhi use samjhne-padhne waale bahut kam hai...
Saartha prayas ke liye bahut dhanyavaad.

Eskay Zee ने कहा…

Bahut azeeb, saras, rahasyapooran katha hai.

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...