शनिवार, मई 01, 2010

है सब आतम सोय प्रकास सांचो

हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे। हरि सिमरत जन गए निसतरि तरेहरि के नाम कबीर उजागर। जनम जनम के काटे कागरनिमत नामदेउ दूध पीआइया। तउ जग जनम संकट नहीं आइआजनम रविदास राम रंग राता। इउ गुर परसाद नरक नहीं जाता
है सब आतम सोय प्रकास सांचो। निरंतरि निराहार कलपित ये पांचों।।आदि मध्य औसान एक रस तारतम नहीं भाई। थावर जंगम कीट पतंगा, पूर रहे हरिराई।।सरवेसुर श्रबपति सब गति, करता हरता सोई। सिव न असिव न साध अरु सेवक, उभय नहीं होई।।धरम अधरम मोक्ष नहीं बंधन, जरा मरण भव नासा। दृष्टि अदृष्टि गेय अरु ज्ञाता, येक मेक रैदासा।।

7 टिप्‍पणियां:

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ने कहा…

मेरा ब्लागिंग उद्देश्य गूढ रहस्यों को
आपस में बांटना और ग्यानीजनों से
प्राप्त करना भी है..इसलिये ये आवश्यक नहीं
कि आप पोस्ट के बारे में ही कमेंट करे कोई
दुर्लभ ग्यान या रोचक जानकारी आप सहर्ष
टिप्पणी रूप में पोस्ट कर सकते हैं ..आप सब का हार्दिक
धन्यवाद
satguru-satykikhoj.blogspot.com

pukhraaj ने कहा…

कुछ कुछ समझ आया कुछ कुछ नहीं .... यदि इसका अर्थ भी समझा देते तो ज्यादा अच्छा होता ...

आदेश कुमार पंकज ने कहा…

मौनता दे अर्थ ऐसे व्याकरण मिलते नहीं हैं |
प्यार हो जग के लिए अंत : करण मिलते नहीं हैं |
शिलाओं का अकेलापन बहुत रोता अंधेरों में ,
जिनकी छुअन आकार दे दे वह चरण मिलते नहीं हैं |

honesty project democracy ने कहा…

अच्छे विचार पर आधारित प्रस्तुती ,साथ में अर्थ और विवेचना भी प्रस्तुत किया करें /

कविता रावत ने कहा…

सिव न असिव न साध अरु सेवक, उभय नहीं होई।।धरम अधरम मोक्ष नहीं बंधन, जरा मरण भव नासा। दृष्टि अदृष्टि गेय अरु ज्ञाता, येक मेक रैदासा।।
Bhavpurn bhkatipurn rachna prasuti ke liye dhanyavaad....

अशोक सिँह रघुवंशी ने कहा…

अतुलनीय प्रयास

श्रीमन्‌,
कृपया मेरा चिट्ठा एक बार पुन: अवलोकित कर लेँ। आप ने टिप्पणी मेँ जिस त्रुटि को इंगित किया था सुधार हुआ या नहीँ।
धन्यवाद।

अशोक सिँह रघुवंशी ने कहा…

अतुलनीय प्रयास

श्रीमन्‌,
कृपया मेरा चिट्ठा एक बार पुन: अवलोकित कर लेँ। आप ने टिप्पणी मेँ जिस त्रुटि को इंगित किया था सुधार हुआ या नहीँ।
धन्यवाद।

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